आसमान से शतरंज की बिसात जैसा दिखता है बार्सिलोना, 45 डिग्री कटे कोनों ने बनाया शहर को खास
इसी डिजाइन को ऑक्टोगोनल ब्लॉक कहा जाता है। इस अनोखी शहरी योजना का श्रेय इंजीनियर इल्डेफॉन्स सेर्डा को जाता है, जिन्होंने 1850 के दशक में इसका खाका तैयार किया था। उस दौर में कारों का इस्तेमाल भी शुरू नहीं हुआ था, लेकिन सेर्डा ने भविष्य में बढ़ने वाले यातायात को ध्यान में रखते हुए ऐसी योजना बनाई, जिसमें चौराहों पर पर्याप्त खुली जगह और वाहनों के लिए बेहतर दृश्यता मिल सके।
ट्रैफिक के साथ हवा और रोशनी का भी रखा ध्यान
45 डिग्री पर कटे कोनों ने चौराहों को अपेक्षाकृत खुला बनाया। इससे हवा के आवागमन में मदद मिली और वाहनों को मोड़ने के लिए बेहतर विजिबिलिटी मिली। यही डिजाइन आज बार्सिलोना की पहचान बन चुका है।
हालांकि, 19वीं सदी के मध्य में बार्सिलोना की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। शहर मध्यकालीन दीवारों के भीतर सीमित था और आबादी का घनत्व बेहद ज्यादा था। संकरी गलियों में धूप और हवा तक ठीक से नहीं पहुंचती थी। गंदगी, प्रदूषण और हैजा जैसी महामारियों ने हालात बेहद खराब कर दिए थे। उस समय आम लोगों की औसत उम्र घटकर करीब 30 से 35 साल रह गई थी।
इसी स्थिति को देखते हुए शहर की पुरानी दीवारों को गिराने का फैसला लिया गया और नए बार्सिलोना की योजना बनाने की जिम्मेदारी इल्डेफॉन्स सेर्डा को मिली।
हर वर्ग के लिए हवा, धूप और हरियाली का सपना
सेर्डा केवल इंजीनियर नहीं, बल्कि समाजवादी विचारक भी थे। उनका मानना था कि शहर में रहने वाले अमीर और गरीब सभी लोगों को ताजी हवा, धूप और हरियाली का समान अधिकार मिलना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने शहर को समान आकार के ब्लॉक्स में बांटने की योजना बनाई।
उनकी मूल योजना में हर ब्लॉक की केवल दो या तीन दिशाओं में इमारतें बनाने और बीच के हिस्से को सार्वजनिक बगीचे या पार्क के तौर पर खाली रखने का प्रस्ताव था। उनका उद्देश्य था कि घर की खिड़की खोलने पर लोगों को कंक्रीट के बजाय हरियाली दिखाई दे। हालांकि, बाद के वर्षों में व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ इन आंतरिक हिस्सों में भी निर्माण होने लगा।
सेर्डा ने दिया ढांचा, गौडी ने भरी कलात्मक जान
बार्सिलोना की पहचान सिर्फ इसकी सड़कों और ब्लॉक्स से नहीं बनी। शहर की वास्तुकला को विशिष्ट बनाने में महान आर्किटेक्ट एंतोनी गौडी की भी बड़ी भूमिका रही। सेर्डा ने शहर को व्यवस्थित और गणितीय स्वरूप दिया, जबकि गौडी ने उसमें कला और प्रकृति का रंग भर दिया।
गौडी कैटलन मॉडर्निज्म के प्रमुख वास्तुकार थे। वे प्रकृति से बेहद प्रभावित थे और उनकी इमारतों में इसका प्रभाव साफ दिखाई देता है। कासा बात्लो की छत ड्रैगन की रीढ़ जैसी नजर आती है, जबकि कासा मिला की बालकनियां समुद्र की लहरों का आभास देती हैं।
वहीं, शहर के केंद्र में मौजूद सग्रादा फैमिलिया अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसके अंदर के स्तंभ पेड़ों जैसी आकृति देते हैं, जिससे प्रकृति और आध्यात्म का अनोखा मेल दिखाई देता है।
आज भी पुराने प्लान से तलाश रहा आधुनिक समाधान
आज बार्सिलोना की आबादी करीब 16.5 लाख है, जबकि पूरे मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में 55 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। हर साल एक करोड़ से अधिक पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इतनी बड़ी आबादी और पर्यटकों के बीच प्रदूषण और ट्रैफिक शहर के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
इन समस्याओं से निपटने के लिए बार्सिलोना प्रशासन सेर्डा की मूल सोच को आधुनिक रूप देकर ‘सुपरब्लॉक्स’ की अवधारणा पर काम कर रहा है। इसमें कई ब्लॉक्स को मिलाकर एक बड़ा सुपरब्लॉक बनाया जाता है और अंदरूनी हिस्सों में वाहनों की आवाजाही सीमित की जाती है।
गाड़ियों को मुख्य रूप से सुपरब्लॉक की बाहरी सड़कों तक सीमित रखा जाता है, जबकि अंदर पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और बच्चों के लिए जगह विकसित की जा रही है। पार्क और कम्युनिटी सेंटर भी बढ़ाए जा रहे हैं। इस मॉडल से शहर में NO2 प्रदूषण का स्तर 25 प्रतिशत तक कम होने का दावा किया गया है।
पुरानी विरासत के साथ आधुनिकता का मेल
बार्सिलोना की खासियत यह भी है कि यहां पुराना और नया साथ-साथ दिखाई देता है। ऐतिहासिक गॉथिक क्वार्टर की 14वीं सदी की संकरी गलियों को संरक्षित रखा गया है, वहीं आधुनिक वित्तीय क्षेत्र में टॉरे ग्लोरीज जैसी बुलेट के आकार की कांच की गगनचुंबी इमारतें शहर के आधुनिक स्वरूप को दर्शाती हैं।
बार्सिलोना की शहरी योजना और वास्तुकला यह संदेश देती है कि शहर केवल इमारतों और सड़कों का समूह नहीं होता। उसकी डिजाइन में इंसानी जीवन, खुली हवा, रोशनी, हरियाली और मानसिक सुकून को भी जगह मिलनी चाहिए। शायद यही वजह है कि बार्सिलोना को जमीन से देखने पर जितना खूबसूरत अनुभव होता है, आसमान से देखने पर उसकी ज्यामितीय बनावट उतनी ही हैरान करती है।
