October 23, 2026

संयुक्त राष्ट्र में भारत की दोटूक, सुरक्षा परिषद में सुधार क्यों अटका, पाकिस्तान समेत कुछ देशों पर उठाए सवाल

0
untitled-1792736288

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर भारत ने एक बार फिर मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि करीब 80 साल पहले हुए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर आज की दुनिया का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद की संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और देशों का उचित प्रतिनिधित्व हो। भारत ने इस मुद्दे पर सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट मसौदा तैयार करने समयसीमा तय करने और बातचीत की दिशा निर्धारित करने की मांग की है।

पी. हरीश ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय करीब 25 लाख भारतीयों ने युद्ध में हिस्सा लिया था और लगभग 90 हजार भारतीय सैन्य सेवा के दौरान मारे गए थे। उन्होंने बंगाल के भीषण अकाल का भी जिक्र किया और कहा कि औपनिवेशिक युद्ध नीतियों से जुड़ी परिस्थितियों के बीच 40 लाख से अधिक लोगों की जान गई थी। उनके मुताबिक इतिहास के इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। भारत का तर्क है कि वैश्विक संस्थाओं की मौजूदा व्यवस्था में उन देशों और लोगों के योगदान को भी महत्व मिलना चाहिए जिन्होंने युद्ध के दौरान भारी कीमत चुकाई थी।

भारत की आपत्ति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों को मिले विशेष अधिकारों और मौजूदा प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लेकर है। वर्ष 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार दिया गया था। इस अधिकार के तहत कोई स्थायी सदस्य सुरक्षा परिषद के कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को रोक सकता है। भारत का मानना है कि दशकों पुरानी व्यवस्था को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत है। हरीश ने कहा कि पुराने युद्ध में जीत के आधार पर बने विशेषाधिकार ऐसी सुरक्षा परिषद की वैधता से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे सकते जिसमें दुनिया का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

सुरक्षा परिषद में सुधार की बातचीत को लेकर भारत ने कुछ देशों के समूह पर भी आपत्ति जताई है। पी. हरीश के अनुसार इटली के नेतृत्व वाला यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस समूह सुधार प्रक्रिया में आगे बढ़ने के लिए जरूरी मसौदा तैयार करने की दिशा में बाधा डाल रहा है। पाकिस्तान भी इस समूह का सदस्य है। इस समूह का रुख सुरक्षा परिषद के विस्तार और स्थायी सदस्यता के विभिन्न प्रस्तावों को लेकर भारत की मांग से अलग है। भारत चाहता है कि सुधार पर चर्चा को अनिश्चितकाल तक खींचने के बजाय उसे ठोस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाए।

भारत की मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि मसौदा तैयार करने से पहले ही आम सहमति की शर्त पर जोर दिया जा रहा है। हरीश का कहना है कि बहुपक्षीय वार्ताओं में सामान्य तौर पर पहले एक लिखित मसौदा तैयार किया जाता है और फिर उस पर बातचीत के जरिए मतभेदों को दूर करने की कोशिश होती है। भारत सवाल उठा रहा है कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए होने वाली अंतर सरकारी वार्ता की प्रक्रिया दूसरी बहुपक्षीय वार्ताओं से अलग क्यों होनी चाहिए।

भारत ने मांग की है कि सुधार प्रक्रिया के लिए लिखित मसौदा सामने लाया जाए और बातचीत की समयसीमा तथा दिशा स्पष्ट की जाए। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार और अपने लिए स्थायी सीट की मांग करता रहा है। उसका कहना है कि आज की वैश्विक व्यवस्था में एशिया अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित विभिन्न क्षेत्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में आगे की बातचीत और देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिशें इस मुद्दे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगी।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *