August 25, 2026

कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश

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वाशिंगटन । हाल ही में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के ‘अपहरण’ के बाद लैटिन अमेरिका में तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब कोलंबिया, क्यूबा और मैक्सिको को भी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि यदि ये देश अपना रवैया नहीं सुधारते हैं तो अमेरिका कार्रवाई करेगा। उन्होंने इस रुख को मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कदम और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी हितों की सुरक्षा से जोड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन देशों की सेनाएं दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना करने में सक्षम हैं?

सैन्य शक्ति में भारी असमानता
इन बयानों ने लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दखल को लेकर पुराने तनावों को फिर जीवित कर दिया है।

जिन देशों को चेतावनी दी गई है, वे वॉशिंगटन के हस्तक्षेप के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन उनकी सेनाओं की क्षमता अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है। अमेरिका की सैन्य ताकत दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। 2025 में उसका रक्षा बजट 895 अरब डॉलर रहा- जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.1 प्रतिशत है। 2025 की ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग के अनुसार ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे शक्तिशाली सेना है और वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है। सक्रिय सैनिकों की संख्या, लड़ाकू विमान, टैंक, नौसैनिक संसाधन और सैन्य बजट- हर पैमाने पर ये देश अमेरिका से काफी पीछे हैं। पारंपरिक युद्ध में अमेरिकी बढ़त स्पष्ट है। लैटिन अमेरिकी सेनाएं अमेरिकी हस्तक्षेप का प्रभावी मुकाबला करने में असमर्थ हैं। हालांकि, कुछ देशों में पैरामिलिट्री फोर्सेस (अर्द्धसैनिक बल) मजबूत हैं, जो असममित युद्ध (गुरिल्ला टैक्टिक्स) में इस्तेमाल हो सकते हैं।

अर्धसैनिक बल: लैटिन अमेरिका का गुप्त हथियार
ऊपर कुछ प्रमुख लैटिन अमेरिकी देशों के नाम दिए गए हैं। लेकिन मुख्य खतरा केवल चार देशों- क्यूबा, कोलंबिया, वेनेजुएला और मेक्सिको पर मंडरा रहा है। इनमें वेनेजुएला पर अमेरिका पहले ही हमला कर उसके राष्ट्रपति को पकड़ लाया है। हालांकि एक क्षेत्र ऐसा है जहां इन देशों के पास तुलनात्मक बढ़त मानी जाती है और वे अमेरिका को नाकों चने चबा सकते हैं।

ये हैं उनके अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) बल। ये समूह अक्सर नियमित सेनाओं के समानांतर काम करते हैं और असममित युद्ध व अपरंपरागत रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

क्यूबा के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल बताया जाता है- करीब 11.4 लाख सदस्य। इनमें देश-नियंत्रित मिलिशिया और पड़ोस आधारित रक्षा समितियां शामिल हैं। सबसे बड़ा संगठन ‘टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया’ है, जो बाहरी खतरों या आंतरिक संकट में नियमित सेना की सहायता के लिए नागरिक रिजर्व के रूप में काम करता है।

वेनेजुएला में सरकार समर्थक नागरिक सशस्त्र समूह- जिन्हें “कोलेक्टिवोस” कहा जाता है पर राजनीतिक नियंत्रण लागू करने और विरोधियों को डराने के आरोप लगते रहे हैं। औपचारिक रूप से ये सशस्त्र बलों का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि राष्ट्रपति मादुरो के शासन में इन्हें राज्य का संरक्षण मिलता रहा है।

कोलंबिया में 1980 के दशक में दक्षिणपंथी अर्धसैनिक समूह उभरे थे, जिनका उद्देश्य वामपंथी विद्रोहियों से लड़ना था। 2000 के दशक के मध्य में इनके औपचारिक विमोचन के बावजूद, कई समूह बाद में आपराधिक या नियो-पैरामिलिट्री संगठनों के रूप में फिर सक्रिय हो गए। शुरुआती दौर में इनका गठन शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी काउंटर-इंसर्जेंसी सलाहकारों के मार्गदर्शन में कोलंबियाई सेना की भागीदारी से हुआ था।

मेक्सिको में भारी हथियारों से लैस ड्रग कार्टेल- जैसे जेटास व्यवहार में अर्धसैनिक ताकत की तरह काम करते हैं।

पूर्व सैनिकों द्वारा बनाए गए इन समूहों के पास सैन्य-स्तरीय हथियार हैं और वे कई इलाकों में क्षेत्रीय नियंत्रण रखते हैं, जिससे स्थानीय पुलिस पर भारी पड़ते हैं। इसी कारण मैक्सिकन सेना को कानून-व्यवस्था में तैनात करना पड़ा है।
किस देश के पास कितने अर्द्धसैनिक बल?
क्यूबा, वेनेजुएला, कोलंबिया और मैक्सिको दुनिया के कुछ सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बलों (पैरामिलिट्री फोर्सेस) वाले देशों में शामिल हैं। ग्लोबल फायरपावर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्सेस इस प्रकार हैं: सबसे ज्यादा बांग्लादेश में 68 लाख, भारत में 25.27 लाख, क्यूबा में 11.45 लाख, चीन में 6.25 लाख, सर्बिया में 6 लाख, पाकिस्तान में 5 लाख, मिस्र में 3 लाख, इंडोनेशिया में 2.5 लाख, रूस में 2.5 लाख, वियतनाम में 2.5 लाख, ईरान में 2.2 लाख, वेनेजुएला में 2.2 लाख, ब्राजील में 2 लाख, अल्जीरिया में 1.5 लाख, कोलंबिया में 1.5 लाख, फ्रांस में 1.5 लाख, सऊदी अरब में 1.5 लाख, तुर्की में 1.5 लाख, लाओस में 1.2 लाख और मैक्सिको में 1.2 लाख सदस्य हैं। इनमें क्यूबा की टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया जैसी इकाइयां, वेनेजुएला के प्रो-गवर्नमेंट कोलेक्टिवोस, कोलंबिया के विभिन्न पैरामिलिट्री ग्रुप्स और मैक्सिको की सुरक्षा बल प्रमुख हैं, जो आंतरिक सुरक्षा और रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अमेरिकी हस्तक्षेप का लंबा इतिहास
पिछले दो सौ वर्षों में अमेरिका ने कई बार लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में ‘बनाना वॉर्स’ के दौरान अमेरिकी सेनाएं मध्य अमेरिका में कॉरपोरेट हितों की सुरक्षा के लिए तैनात रहीं।
1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने ‘गुड नेबर पॉलिसी’ के तहत गैर-हस्तक्षेप का वादा किया।

लेकिन शीत युद्ध के दौरान स्थिति बदली। 1947 में स्थापित अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के समन्वय से अमेरिका ने कई निर्वाचित सरकारों को गिराने के अभियानों को फंड किया। पनामा एकमात्र लैटिन अमेरिकी देश है, जहां अमेरिका ने औपचारिक रूप से सैन्य हमला किया। इसने 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के नेतृत्व में Operation Just Cause चलाया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को हटाना था, जिन्हें बाद में ड्रग तस्करी सहित अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पूर्ण युद्ध होता है, तो लैटिन अमेरिकी देशों की नियमित सेनाएं अमेरिकी तकनीक और वायु सेना का मुकाबला नहीं कर पाएंगी। हालांकि, इन देशों में मौजूद विशाल अर्धसैनिक नेटवर्क और छापामार लड़ाके अमेरिका के लिए किसी भी जमीनी कार्रवाई को बेहद जटिल और खूनी बना सकते हैं।

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