March 10, 2026

पाकिस्तान में 1947 के बाद पहली बार संस्कृत पढ़ाई जाएगीस्कूलों में मिलेगा भगवद गीता का ज्ञान

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नई दिल्ली । पाकिस्तान में 1947 के विभाजन के बाद पहली बार संस्कृत को औपचारिक रूप से शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज ने शास्त्रीय संस्कृत में चार क्रेडिट का कोर्स शुरू किया हैजिसमें महाभारत और भगवद गीता के ज्ञान को छात्रों तक पहुँचाया जाएगा। यह कदम पाकिस्तान में सांस्कृतिक और भाषाई एकता को बढ़ावा देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है।

LUMS का संस्कृत कोर्स

लाहौर विश्वविद्यालय ने संस्कृत को लेकर एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू की हैजिसमें शास्त्रीय संस्कृत का अध्ययन कराया जाएगा। इस चार क्रेडिट कोर्स की शुरुआत तीन महीने चलने वाली वीकेंड वर्कशॉप से हुई थीजिसे छात्रों और विद्वानों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। इस कोर्स के अंतर्गत महाभारत टेलीविजन श्रृंखला की प्रसिद्ध थीम ‘है कथा संग्राम की का उर्दू संस्करण भी पढ़ाया जाएगा।

यह कोर्स विशेष रूप से उन छात्रों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो संस्कृत के शास्त्रीय ज्ञान और भारतीय साहित्य से जुड़ी गहरी समझ प्राप्त करना चाहते हैं। यह पहल भारतीय साहित्य और संस्कृति को समझने का एक सशक्त मंच प्रदान करती हैजिससे पाकिस्तान में संस्कृत के प्रति जागरूकता और रुचि में वृद्धि होगी।

पाकिस्तान के समृद्ध संस्कृत संग्रह पर ध्यान

गुरमानी सेंटर के निदेशक डॉ. अली उस्मान कासमी ने पाकिस्तान के संस्कृत संग्रह की स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में संस्कृत के सबसे समृद्ध लेकिन उपेक्षित संग्रहों में से एक हैजिसे 1930 के दशक में विद्वान जेसीआर वूल्नर ने सूचीबद्ध किया था। हालांकि1947 के बाद से किसी पाकिस्तानी विद्वान ने इस संग्रह से जुड़ी गहरी रिसर्च नहीं की।

डॉ. कासमी का मानना है कि यदि स्थानीय विद्वानों को प्रशिक्षित किया जाएतो पाकिस्तान में संस्कृत के अध्ययन और शोध को एक नई दिशा मिल सकती है। उनका कहना है कि संस्कृत के माध्यम से पाकिस्तान में महाभारत और भगवद गीता जैसे महत्वपूर्ण भारतीय ग्रंथों का अध्ययन करने से न केवल सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित किया जा सकता हैबल्कि यह क्षेत्रीय इतिहास और साहित्य को भी एक नया आयाम देगा।

डॉ. शाहिद रशीद का योगदान

फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद ने इस पहल को संभव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संस्कृत का अध्ययन करते हुए इस कोर्स को शुरू करने के लिए प्रेरित किया। डॉ. रशीद ने अरबी और फारसी के अध्ययन के बाद संस्कृत सीखी और इस क्षेत्र के प्रसिद्ध विद्वान एंटोनिया रुपेल और मैकमास टेलर के मार्गदर्शन में संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया। डॉ. रशीद का मानना है कि शास्त्रीय भाषाओंविशेष रूप से संस्कृत मेंमानवता के लिए गहन ज्ञान छिपा हुआ हैजो अन्यथा अनुपस्थित रह सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत केवल एक धर्म विशेष की भाषा नहीं हैबल्कि यह पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर है।

संस्कृत के माध्यम से सांस्कृतिक एकता

डॉ. शाहिद रशीद ने संस्कृत के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह भाषा ना सिर्फ भारतीय साहित्य और संस्कृति की पहचान हैबल्कि पाकिस्तान और भारत के बीच सांस्कृतिक पुल बनाने का एक माध्यम भी हो सकती है। उन्होंने आशा जताई कि यदि भारत में हिंदू और सिख अरबी भाषा सीखेंऔर पाकिस्तान में अधिक मुस्लिम संस्कृत सीखेंतो यह दोनों देशों के बीच भाषा के माध्यम से बेहतर समझ और सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

भविष्य की योजना और उम्मीदें

डॉ. कासमी ने भविष्य की योजनाओं का खुलासा करते हुए कहा कि अगले 10-15 वर्षों में पाकिस्तान में महाभारत और भगवद गीता के विद्वान उभर सकते हैं। यह पहल पाकिस्तान में शास्त्रीय संस्कृत शिक्षा को नया जीवन देगीजिससे सांस्कृतिक अध्ययन और शोध को नई दिशा मिलेगी।
इस प्रकारपाकिस्तान में संस्कृत को शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करना न केवल एक ऐतिहासिक कदम हैबल्कि यह एक बड़ी सांस्कृतिक और शैक्षिक क्रांति की शुरुआत हो सकती हैजो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और भाषाई संबंधों को प्रगाढ़ बनाएगी।

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