November 5, 2026

ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन घटेगी ताकत! मिडटर्म में हार के बाद बढ़ेंगी मुश्किलें

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नई दिल्ली। अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए आगे का कार्यकाल चुनौतीपूर्ण हो सकता है। संसद के दोनों सदनों में बहुमत गंवाने की स्थिति में उन्हें बजट, नियुक्तियों और कानूनों से जुड़े फैसलों पर डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसका असर उनकी घरेलू नीतियों के साथ भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और वीजा नीति पर भी पड़ सकता है।

मिडटर्म चुनावों को मौजूदा राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की राय के तौर पर देखा जाता है। इन चुनावों में राष्ट्रपति का पद नहीं बदलता, लेकिन संसद में विपक्ष का बहुमत हो जाने पर सरकार के फैसलों और नीतियों पर उसका नियंत्रण बढ़ जाता है। ट्रंप अपना दो साल का बचा कार्यकाल पूरा करेंगे, लेकिन उनके लिए पहले की तरह एकतरफा फैसले लेना आसान नहीं होगा।

संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन को झटका

प्रतिनिधि सभा की कुल 435 सीटों में से चुनावी नतीजों के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने खबर लिखे जाने तक 228 सीटें जीत ली हैं। यह बहुमत के आंकड़े से 10 सीट अधिक है। वहीं, ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी 139 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी है। पिछली बार रिपब्लिकन पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में 220 सीटें थीं।

सीनेट की 100 सीटों में से 35 पर चुनाव हुए थे। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, नतीजों के बाद डेमोक्रेट्स की संख्या 54 और रिपब्लिकन सदस्यों की संख्या 44 हो गई है। इस तरह दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कमजोर बताई जा रही है।

साल 1938 के बाद हुए 22 मिडटर्म चुनावों में से 20 में तत्कालीन राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी उनकी पार्टी को मिडटर्म चुनावों में झटका लगा था। इस बार भी नतीजे उनके लिए राजनीतिक चुनौती बढ़ा सकते हैं।

फैसलों और सरकारी कामकाज पर बढ़ेगी निगरानी

संसद में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप प्रशासन के कामकाज पर डेमोक्रेट्स की निगरानी बढ़ सकती है। प्रतिनिधि सभा की प्रमुख समितियों की अध्यक्षता विपक्ष के पास जाने पर ट्रंप के करीबी अधिकारियों और प्रशासनिक फैसलों की जांच की मांग उठ सकती है।

बजट और टैक्स से जुड़े प्रस्तावों को पारित कराना भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुश्किल हो सकता है। डेमोक्रेट्स इन प्रस्तावों में बदलाव की मांग कर सकते हैं या उन्हें रोकने की कोशिश कर सकते हैं। इससे सरकारी कामकाज प्रभावित होने की आशंका है।

सीनेट में बहुमत का असर नियुक्तियों पर भी पड़ेगा। अमेरिकी व्यवस्था में सीनेट कैबिनेट मंत्रियों, संघीय अधिकारियों और कई न्यायिक पदों पर नियुक्तियों को मंजूरी देती है। ऐसे में ट्रंप की पसंद के उम्मीदवारों की नियुक्ति अटक सकती है या उन्हें डेमोक्रेट्स के साथ समझौता करना पड़ सकता है।

वीटो की ताकत, लेकिन संसद के पास भी है रास्ता

ट्रंप ने कहा है कि यदि वे खुद चुनाव मैदान में उतरे होते तो जीत जाते। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने बचे हुए दो साल हर फैसले पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते।

अमेरिकी राष्ट्रपति को संविधान के तहत संसद से पारित विधेयक पर वीटो लगाने का अधिकार है। इसके जरिए राष्ट्रपति किसी विधेयक को कानून बनने से रोक सकते हैं। हालांकि, यह अधिकार अंतिम नहीं है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद-1 के तहत प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रपति के वीटो को निरस्त कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना भी कानून बन सकता है।

इसलिए संसद में विपक्ष का बहुमत ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती होगा, लेकिन इससे राष्ट्रपति के सभी अधिकार खत्म नहीं हो जाएंगे।

‘लेम डक’ राष्ट्रपति बनने का खतरा

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप के बचे हुए कार्यकाल में उनकी पार्टी के भीतर भी असहमति बढ़ सकती है। उनका यह दूसरा राष्ट्रपति कार्यकाल है और अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के अनुसार कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं चुना जा सकता। ऐसे में ट्रंप तीसरी बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं बन पाएंगे।

इसका असर रिपब्लिकन पार्टी में उनके प्रभाव पर पड़ सकता है। अगले राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टी के नेता और संभावित उम्मीदवार अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर सकते हैं। वे ट्रंप के हर फैसले का समर्थन करने के बजाय उनसे दूरी भी बना सकते हैं।

इसी संदर्भ में ट्रंप को ‘लेम डक’ राष्ट्रपति कहा जा रहा है। इस शब्द का इस्तेमाल ऐसे राष्ट्रपति के लिए होता है, जिसका कार्यकाल जारी तो रहता है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव और फैसले लागू कराने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

महाभियोग और एपस्टीन फाइल्स से बढ़ सकती है मुश्किल

प्रतिनिधि सभा में बहुमत मिलने के बाद डेमोक्रेट्स ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, केवल प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित होना राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सीनेट में मुकदमे के बाद दो-तिहाई सदस्यों का दोषी ठहराने के पक्ष में मतदान जरूरी होता है।

डेमोक्रेट्स एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर भी ट्रंप प्रशासन को घेर सकते हैं। न्याय विभाग की ओर से इन दस्तावेजों को जारी करने में देरी और उनमें की गई काट-छांट को लेकर अटॉर्नी जनरल से सवाल पूछे जा सकते हैं। संसद इस मामले में जांच की मांग भी कर सकती है।

ट्रंप यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साथ किसी अनुचित संबंध से इनकार करते रहे हैं। हालांकि, दोनों की साथ में कई तस्वीरें सार्वजनिक हो चुकी हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और जांच की मांग उनके लिए नई परेशानी खड़ी कर सकती है।

ट्रंप परिवार के कारोबार पर भी उठ सकते हैं सवाल

मिडटर्म चुनावों के नतीजों का असर ट्रंप और उनके परिवार के कारोबारी हितों पर भी पड़ सकता है। खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में ट्रंप ने अपने कारोबार से करीब 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक कमाए। डेमोक्रेट्स वित्तीय खुलासे से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर इन कमाई के स्रोतों और कारोबारी सौदों की जांच की मांग कर सकते हैं।

ट्रंप परिवार के क्रिप्टो कारोबार भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप से जुड़े क्रिप्टो वेंचर वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल से करीब 4,730 करोड़ रुपये और ‘ट्रम्प मीम कॉइन’ से 5,676 करोड़ रुपये की कमाई का दावा किया गया है।

इसके अलावा वर्ष 2025 में ट्रंप के नाम से 20 हजार से अधिक स्टॉक डील होने का दावा किया गया है। डेमोक्रेट्स का आरोप है कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए स्टॉक ट्रेडिंग करना हितों के टकराव का मामला हो सकता है। ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर से जुड़ी कारोबारी गतिविधियों पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। आरोप है कि मध्य-पूर्व में शांति दूत की भूमिका निभाने के दौरान उन्हें क्षेत्र से भारी फंडिंग मिली। हालांकि, इन आरोपों की जांच और निष्कर्ष अलग-अलग प्रक्रिया का विषय हैं।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजों का असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है। खासकर व्यापार समझौते, टैरिफ और वीजा नीति के मामले में भारत के लिए नई संभावनाएं बन सकती हैं।

अमेरिका भारतीय सामानों का बड़ा बाजार है। इसलिए अमेरिकी टैरिफ नीति में किसी भी बदलाव का सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ता है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अभी अंतिम रूप नहीं ले सका है। इसी महीने भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे अंतिम चरण में बताया था। हालांकि, चुनाव से पहले इस बयान को ट्रंप प्रशासन की राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा गया।

चुनावी नतीजों के बाद दो तरह की स्थितियां बन सकती हैं। पहली, ट्रंप भारत पर दबाव बढ़ाकर अपनी शर्तों के मुताबिक व्यापार समझौता कराने की कोशिश कर सकते हैं। दूसरी, संसद में उनकी राजनीतिक ताकत कम होने से भारत को बातचीत में बेहतर स्थिति मिल सकती है।

ट्रेड थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक, ट्रंप समझौते के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से अपने कार्यकारी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत की प्रमुख चिंता यह है कि अमेरिकी टैरिफ ऐसे स्तर पर रहें, जिससे भारतीय कंपनियां वहां दूसरे देशों की कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

H-1B वीजा और इमिग्रेशन नीति पर भी असर संभव

अमेरिकी चुनावी नतीजों का असर वीजा और इमिग्रेशन नीति पर भी पड़ सकता है। डेमोक्रेट्स का बहुमत बढ़ने से ट्रंप प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीतियों को संसद में विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इससे H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है।

हालांकि, वीजा नीति में बदलाव केवल चुनावी नतीजों से तय नहीं होगा। इसके लिए संसद में प्रस्ताव, प्रशासनिक फैसले और दोनों दलों के बीच सहमति भी जरूरी होगी।

कुल मिलाकर, मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान होने से ट्रंप का राष्ट्रपति पद तो बरकरार रहेगा, लेकिन संसद में विरोधी दल का प्रभाव बढ़ने से उनके फैसलों पर अंकुश लग सकता है। इसका असर अमेरिकी घरेलू राजनीति से लेकर भारत के साथ व्यापार और वीजा संबंधों तक दिखाई दे सकता है।

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