गोलन हाइट्स पर पहले इजरायल को 'कब्जाधारी' बताया, फिर पलटे अमेरिकी राजदूत टॉम बराक
बराक ने लेबनानी-ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी और पत्रकार मारियो नौफल को दिए इंटरव्यू में गोलन हाइट्स का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि इजरायल अभी भी इस इलाके पर कब्जा किए हुए है और यह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप नहीं है।
1967 में इजरायल ने किया था कब्जा
गोलन हाइट्स सीरिया का रणनीतिक क्षेत्र है। 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के दौरान इजरायल ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया था। 1981 में इजरायल ने इसे अपने में मिला लिया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश देश आज भी इस कदम को मान्यता नहीं देते।
अमेरिका का रुख हालांकि अलग रहा है। 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने गोलन हाइट्स पर इजरायल की संप्रभुता को मान्यता दी थी। यह इस मुद्दे पर दशकों पुरानी अमेरिकी नीति में बड़ा बदलाव था।
विवाद बढ़ा तो बराक ने दी सफाई
गोलन हाइट्स को लेकर दिए बयान के बाद अमेरिकी राजदूत सवालों के घेरे में आ गए। इजरायल की ओर से भी उनके बयान पर आपत्ति जताई गई। इसके बाद रविवार को बराक ने स्पष्ट किया कि उनके बयान का मतलब संयुक्त राष्ट्र के रुख का समर्थन करना नहीं था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बराक ने कहा कि 2019 में ट्रंप ने गोलन हाइट्स को लेकर जो अमेरिकी नीति तय की थी, उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि वह गोलन हाइट्स का उदाहरण दक्षिणी लेबनान की स्थिति को समझाने के लिए दे रहे थे। उनका कहना था कि बातचीत के जरिए हुए समझौते केवल नक्शे बदलने की तुलना में ज्यादा टिकाऊ होते हैं।
अमेरिकी सांसद और इजरायल ने जताई आपत्ति
बराक के बयान पर रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट ने भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि अमेरिकी राजदूत ट्रंप के उस फैसले को भूल गए हैं, जिसमें गोलन हाइट्स को इजरायल का हिस्सा माना गया था।
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने भी बराक के बयान का विरोध किया और इसे ट्रंप की नीति के बिल्कुल विपरीत बताया।
सीरिया एयरबेस पर भी बयान से विवाद
टॉम बराक इसी इंटरव्यू में सीरिया के एक एयरबेस पर इजरायली हमले की आलोचना को लेकर भी चर्चा में आए। इजरायल ने मंगलवार को एयरबेस पर हमला किया था। उसका कहना था कि वह सीरिया में तुर्की की सैन्य मौजूदगी को रोकने के लिए की गई कार्रवाई थी।
रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने रविवार को इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि इजरायल सीरिया में तुर्की की ऐसी सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा, जिससे उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो।
हिजबुल्लाह पर भी देनी पड़ी सफाई
बराक का एक अन्य बयान भी विवाद का कारण बना। उन्होंने इजरायल-लेबनान मुद्दे पर कहा था कि बातचीत की मेज से हिजबुल्लाह और ईरान गायब हैं। इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि वह दोनों को वार्ता में शामिल करने की बात कर रहे हैं।
हालांकि, बराक ने बाद में स्पष्ट किया कि अमेरिका हिजबुल्लाह से बातचीत नहीं करता। उनका मकसद केवल यह बताना था कि इजरायल-लेबनान का मुद्दा जटिल है, क्योंकि हिजबुल्लाह को हथियार और आर्थिक मदद ईरान से मिलती है।
