September 9, 2026

धुरंधर की कहानी पर तिग्मांशु धूलिया ने उठाए सवाल, रणवीर सिंह की फिल्म की तारीफ के बावजूद बोले- क्या यही कहानी है

0
5-1788941292

नई दिल्ली । रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर’ ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और बॉक्स ऑफिस पर भी मजबूत प्रदर्शन किया। फिल्म की सफलता के बावजूद इसके कंटेंट और कहानी को लेकर अब फिल्म निर्माता-निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में बदलते कहानी कहने के तरीके पर चर्चा करते हुए ‘धुरंधर’ को मौजूदा फिल्मी फॉर्मूले का उदाहरण बताया।

तिग्मांशु धूलिया के मुताबिक आज के दौर में कॉरपोरेट संस्कृति और एक जैसे फिल्मी टेम्पलेट के कारण मौलिक कहानियों की संख्या कम होती जा रही है। उनका मानना है कि बड़े स्तर पर बनने वाली कई फिल्मों में कहानी से ज्यादा प्रस्तुति, एक्शन और स्टार पावर पर जोर दिखाई देता है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘पुष्पा’, ‘केजीएफ’ और ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का उदाहरण दिया।

हालांकि, तिग्मांशु ने ‘धुरंधर’ को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने फिल्म के पहले पार्ट की प्रस्तुति की तारीफ की और कहा कि उन्हें फिल्म पसंद आई। उनके अनुसार फिल्म को अच्छे तरीके से पेश किया गया था और इसका संगीत भी प्रभावशाली था। लेकिन जब बात कहानी की आती है तो उन्होंने इसकी मौलिकता पर सवाल खड़ा किया।

तिग्मांशु ने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर किसी दर्शक से ‘धुरंधर’ की कहानी सुनाने के लिए कहा जाए तो वह वास्तव में कितनी विस्तृत कहानी बता पाएगा। उन्होंने फिल्म की कहानी को एक ऐसे व्यक्ति की कहानी के रूप में बताया जो अंडरकवर एजेंट बनकर पाकिस्तान जाता है और वहां तबाही मचाता है। इसी आधार पर उन्होंने सवाल किया कि क्या इसे पूरी तरह एक मौलिक और मजबूत कहानी माना जा सकता है।

उनकी टिप्पणी केवल ‘धुरंधर’ तक सीमित नहीं रही। तिग्मांशु ने हिंदी सिनेमा में मौलिक कहानियों की कमी को लेकर व्यापक चिंता जताई। उनका कहना है कि पहले ऐसे लोग मौजूद थे जो अलग तरह की कहानियां सुनाते थे, लेकिन अब ऐसे कहानीकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। फिल्म उद्योग में यह धारणा भी बनी हुई है कि अलग और प्रयोगात्मक कहानियां दर्शकों को पसंद नहीं आएंगी।

तिग्मांशु के अनुसार इसी सोच की वजह से फिल्मों में एक जैसे फॉर्मूले दोहराए जा रहे हैं। उनका मानना है कि इसका असर केवल फिल्मों की कहानियों पर नहीं बल्कि समाज और संस्कृति की विविधता पर भी दिखाई देता है। उन्होंने पूंजीवाद और एक जैसी उपभोक्ता संस्कृति का उदाहरण देते हुए कहा कि आज लोगों की पसंद, पहनावे और यहां तक कि शहरों की पहचान में भी समानता बढ़ती जा रही है।

उन्होंने कहा कि जब हर चीज एक ही पैटर्न पर तैयार होने लगे तो अलग पहचान धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। उनके मुताबिक यही स्थिति फिल्म इंडस्ट्री में भी दिखाई दे रही है, जहां अलग तरह की कहानियों के बजाय सफल साबित हो चुके फॉर्मूलों को दोहराने पर ज्यादा भरोसा किया जाता है।

तिग्मांशु धूलिया के अपने काम की बात करें तो उनकी आगामी फिल्म ‘घमासान’ 11 सितंबर 2026 को रिलीज होने वाली है। ऐसे में ‘धुरंधर’ की कहानी पर उनकी टिप्पणी उस समय सामने आई है जब हिंदी सिनेमा में बड़े बजट की फिल्मों, स्टार आधारित कहानियों और मौलिक कंटेंट को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। उनकी बातों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि दर्शकों को आकर्षित करने वाली भव्य प्रस्तुति के साथ क्या मजबूत और नई कहानी को भी बराबर महत्व मिल रहा है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *