October 24, 2026

रफी साहब भी जिसके गानों के थे दीवाने, जिंदगी में आए ऐसे मोड़ कि जेल तक पहुंच गए मन्ना डे! जानिए अनसुने किस्से

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नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में अपनी सुरीली आवाज और शास्त्रीय संगीत पर मजबूत पकड़ से पहचान बनाने वाले मन्ना डे आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं। एक चतुर नार बड़ी होशियार और ऐ मेरी जोहरा जबीं जैसे सदाबहार गीतों से लेकर जिंदगी कैसी है पहेली तक उन्होंने संगीत की दुनिया को अनमोल खजाना दिया। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की गहराई भी थी और आम जिंदगी से जुड़ी भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति भी। 24 अक्टूबर 2013 को दुनिया को अलविदा कहने वाले मन्ना डे की 13वीं पुण्यतिथि पर उनकी जिंदगी के ऐसे किस्से याद किए जा रहे हैं जो उनके संघर्ष प्रतिभा और दिलचस्प व्यक्तित्व को सामने लाते हैं।

मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे था। उनका जन्म 1 मई 1919 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत के साथ कुश्ती और मुक्केबाजी का भी शौक था। वह पहलवान बनकर अपनी पहचान कायम करना चाहते थे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने कुश्ती का प्रशिक्षण लिया और ऑल बंगाल कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुंचे। उनकी आत्मकथा मेमोरीज कम अलाइव में इस दौर से जुड़े अनुभवों का जिक्र मिलता है। हालांकि कमजोर होती नजर उनके खेल के रास्ते में बाधा बन गई। कुश्ती के दौरान चश्मे के टूटने से उन्हें चोट भी लगी। आखिरकार उन्हें खेल और संगीत में से किसी एक को चुनना पड़ा और उन्होंने संगीत को अपना जीवन बना लिया। यही फैसला आगे चलकर भारतीय संगीत के इतिहास में यादगार साबित हुआ।

पढ़ाई के दौरान भी मन्ना डे की गायकी का जादू दिखाई देने लगा था। स्कॉटिश चर्च कॉलेज में वह दोस्तों के बीच मेज को तबले की तरह बजाकर गाने गाते थे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार तीन साल तक कॉलेजों के बीच आयोजित गायन प्रतियोगिताओं में पहला स्थान हासिल किया। उनके चाचा कृष्ण चंद्र डे ने उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा दी। इसके बाद उन्होंने उस्ताद अमान अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे संगीत गुरुओं से प्रशिक्षण लिया। शास्त्रीय संगीत की बारीकियों पर उनकी पकड़ ने उन्हें दूसरे गायकों से अलग पहचान दिलाई।

साल 1942 में मन्ना डे अपने चाचा के साथ मुंबई पहुंचे। यहां उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। शुरुआत में उन्होंने संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया और 1943 की फिल्म तमन्ना से पार्श्व गायन की शुरुआत की। सुरैया के साथ गाया गया उनका शुरुआती गीत उनके करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल रहा। बाद में फिल्म मशाल के गीत ऊपर गगन विशाल ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। उन्होंने छह दशकों से अधिक लंबे करियर में हिंदी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं में 3500 से ज्यादा गीत रिकॉर्ड किए।

मन्ना डे की प्रतिभा का सम्मान उनके समकालीन दिग्गज गायक भी करते थे। मोहम्मद रफी की ओर से उनकी गायकी की प्रशंसा किए जाने का किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। वहीं 1968 की फिल्म पड़ोसन का गीत एक चतुर नार आज भी उनके हुनर का शानदार उदाहरण माना जाता है। इस गीत में किशोर कुमार के साथ उनकी गायकी का मुकाबला श्रोताओं को खूब पसंद आया। इसके अलावा फिल्म आनंद का जिंदगी कैसी है पहेली गीत भी उनकी पहचान का अहम हिस्सा बना।

मन्ना डे की जिंदगी में एक ऐसा प्रसंग भी आया जब उन्हें पुलिस हिरासत में जाना पड़ा। बताया जाता है कि वह लखनऊ में एक संगीत कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे लेकिन कार्यक्रम के आयोजक गायब हो गए। दर्शकों के नाराज होने और शिकायत किए जाने के बाद पुलिस ने उनसे पूछताछ की। बाद में अन्य कलाकारों के हस्तक्षेप से मामला सुलझ गया और उन्हें राहत मिली। यह घटना उनके जीवन के उन अनपेक्षित मोड़ों में शामिल हो गई जिनकी चर्चा आज भी होती है।

मन्ना डे की निजी जिंदगी भी भावनात्मक उतार-चढ़ाव से भरी रही। उनकी पत्नी सुलोचना कुमरन का जनवरी 2012 में निधन हो गया था। दोनों ने करीब छह दशक साथ बिताए थे। पत्नी के जाने के बाद उनके जीवन में अकेलापन बढ़ गया। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बाद 24 अक्टूबर 2013 को बेंगलुरु में उनका निधन हो गया। भले ही मन्ना डे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज और सदाबहार गीत संगीत प्रेमियों की कई पीढ़ियों को आज भी मंत्रमुग्ध कर रहे हैं।

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