प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान
-प्रो. एस.के.सिंहदुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का जब एक विशेष पक्ष लोकप्रियता के शिखर पर होता है तो उसकी छाया में व्यक्ति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतायें ओझल हो जाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् के रूप में है, किंतु इन उपलब्धियों की छाया में उनकी एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता पेंटिंग (चित्रकला) की प्रतिभा दबकर रह गई एवं उसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो पायी।
वस्तुत: इसी तरह प्रखर क्रांतिकारी रणनीतिकार एवं कालापानी की कठोर यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की क्रांतिकारी छवि एवं उनके व्यापक संघर्षों की छाया में उनका महत्वपूर्ण ‘भाषाशुद्धि आन्दोलन’ जन-मानस में उतनी ख्याति नहीं पा सका, जिसका कि वह आन्दोलन हकदार था। उन्होंने देवनागरी लिपि को आधुनिक मुद्रण एवं टंकण के अनुरूप बनाने हेतु अनेक व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किये।
इतना ही नहीं, इसके अलावा इतिहास लेखन के माध्यम से औपनिवेशिक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए भारतीय इतिहास की तार्किक एवं गौरवपूर्ण पुनर्व्याख्या प्रस्तुत की। सावरकर के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के प्रभाव में उनका गंभीर अकादमिक एवं बौद्विक योगदान प्रायः ओझल ही रहा। एतिहासिक दृष्टि एवं तथ्यों के आधार पर देखें तो मुगलकाल में फारसी-अरबी का प्रभुत्व तथा औपनिवेशक काल में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत को भाषाई स्तर पर भारी चुनौतियों और उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज की ‘राजभाषा नीति’ और 20वीं शताब्दी में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा चलाए गए ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से भाषाई अतिक्रमण की चुनौतियों का प्रतिकार किया गया।
सावरकर की 1926 में प्रकाशित पुस्तक ‘भाषाशुद्वि’ उनके आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बनी। यह केवल व्याकरण संबंधी पुस्तक नहीं बल्कि सावरकर जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। अत्यधिक विदेशी शब्दों के प्रयोग को वे बौद्विक गुलामी का प्रतीक मानते थे। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने मराठी में घर कर गये उर्दू, अरबी एवं फारसी के शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतिक मूल के शब्दों के प्रयोग का आव्हान किया।
वस्तुत: उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं को अधिक सामथ्र्यवान तथा मौलिक बनाने के लिये उन्हें अपनी मूल जड़ संस्कृत से जुड़ना होगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाषाशुद्वि का लक्ष्य किसी का अंधा विरोध नहीं बल्कि शब्दों का विवेकपूर्ण चयन करना है। उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ शब्द अपनाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए, लेकिन जहां देशी शब्द उपलब्ध हों वहां विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
सावरकर जी ने न केवल पूर्णतः नवीन शब्दों का निर्माण किया बल्कि उन्होंने भाषा में पहले से मौजूद शब्दों को पुनर्जीवित तथा पुनः परिभाषित भी किया। उन्होंने मेयर के लिये ‘महापौर’, टेलीग्राम के लिये ‘तार’, लाउडस्पीकर के लिये ‘ध्वनिवर्धक’, कॉलेज के लिये ‘महाविद्यालय’, कॉलम के लिये ‘स्तम्भ’, स्पेशल इश्यू के लिए ‘विशेषांक’ और प्रोफेसर के लिये ‘प्राध्यापक’ जैसे शब्दों का सृजन किया। इसके अतिरिक्त भाषाशुद्वि के लिहाज से सावरकर जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उन शब्दों को पुनःस्थापित करना माना जाना चाहिये जो व्यवहार से लुप्त हो चुके थे।
उन्होंने बहुत से संस्कृत और मराठी शब्दों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रचारित एवं प्रतिस्थापित किया। उदाहरण के लिये उन्होंने स्कूल के लिये ‘शाला’, गवर्नेन्स के लिये ‘शासन’, हेडमास्टर के लिये ‘मुख्याध्यापक’ जैसे पहले से मौजूद शब्दों को आधुनिक संस्थागत प्रयोग में लाने का आव्हान किया। उनका मानना था कि भाषाशुद्वि का अर्थ केवल नये शब्दों का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद शब्दों को पुनःस्थापित करना और भाषा की खोई हुई जीवंतता को पुनः प्राप्त करना भी है।
विश्रामगृह, प्रशिक्षण, संसद, न्यायालय, जनपद, आरक्षण, विशेषाधिकार, अभियंता, अनुमोदन, प्रतिवेदन, परिषद, राजदूत, दिनांक, दिग्दर्शक जैसे शब्दों को पुनः प्रतिस्थापित करने का श्रेय सावरकर जी को ही जाता है। उन्होंने सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक क्रियान्वयन पर बल दिया तथा अपने भाषणों, ग्रन्थों में उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया।
अत: आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा में शिक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा पर विशेष बल दे रही है, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित किया जा सके। इन परिस्थितियों में सावरकर जी का ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ और भी महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हो जाता है। वर्तमान समय में इसे नये संदर्भ में देखा जाना चाहिये। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम ज्ञान का सृजन अपनी भाषाओं में करें। हमें केवल अनुवाद पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। इसके लिये शिक्षण संस्थानो में ‘भाषा नियोजन’ को एक स्वतंत्र अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया जाना आवश्यक है।
सावरकर जी के अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वैचारिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक स्वावलंबन, स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान का प्रतीक भी होती है। स्वदेशी शब्दावली के पुनरूत्थान में सावरकर जी का अद्वितीय योगदान है। उनका दर्शन एवं साहित्यक कृतियां आज भी भारतीय बौद्विक और अकादमिक जगत के लिये एक महत्वपूर्ण आधार हैं। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और भाषाई योगदान उन्हें एक महान विचारक और शिक्षाविद के रूप में स्थापित करता है। उनके द्वारा गढ़े गये प्रशासनिक, तकनीकी एवं संसदीय शब्द आज भी हमारी लोकतांत्रिक और अकादमिक शब्दावली में जीवंत हैं।
(लेखक जीवाजी विश्वविद्यालय में वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययनशाला विभागाध्यक्ष हैं)
