June 8, 2026

“जंगल में पड़ी दवाइयाँ: आखिर कब तक गरीबों की जिंदगी और जनता का पैसा यूँ बर्बाद होता रहेगा?”

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अशोक कुमार झा
झारखंड के लातेहार जिले के मनिका क्षेत्र से सामने आई एक तस्वीर ने न केवल राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा किया है बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही, सरकारी संसाधनों के उपयोग और गरीबों के अधिकारों को लेकर भी एक बड़ी बहस छेड़ दी है। मनिका थाना और दोमुहान नदी के बीच जंगल में बड़ी मात्रा में सरकारी दवाइयों का फेंका जाना केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की भयावह सच्चाई है जिसमें एक तरफ गरीब मरीज अस्पतालों में दवा के लिए भटकते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं मरीजों के लिए खरीदी गई दवाइयाँ जंगलों और सड़कों पर कचरे की तरह फेंक दी जाती हैं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए पर्याप्त है।

सरकारी दवाइयाँ कोई साधारण वस्तु नहीं होतीं। इनके पीछे करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन खर्च होता है। यह धन किसी मंत्री, अधिकारी या विभाग की निजी संपत्ति नहीं बल्कि देश और राज्य के करोड़ों करदाताओं की मेहनत की कमाई से आता है। जब सरकार दवाइयाँ खरीदती है तो उसका उद्देश्य यह होता है कि आर्थिक रूप से कमजोर, गरीब और जरूरतमंद मरीजों को समय पर उपचार मिल सके लेकिन यदि वही दवाइयाँ अस्पतालों तक पहुंचने के बजाय जंगलों में फेंकी जा रही हों, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि जनता के विश्वास के साथ किया गया खुला विश्वासघात है।

आज झारखंड के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों को अक्सर यह सुनने को मिलता है कि अस्पताल में दवा उपलब्ध नहीं है। कई बार डॉक्टर मरीजों को बाहर की दुकानों से दवा खरीदने की सलाह देते हैं। गरीब परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जमीन बेचनी पड़ती है या फिर इलाज अधूरा छोड़ना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण हजारों लोग समय पर उपचार नहीं मिलने से गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। ऐसे माहौल में यदि लाखों रुपये मूल्य की सरकारी दवाइयाँ जंगल में पड़ी मिलती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मरीजों तक दवा पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी और वह जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई गई?

इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह कोई सामान्य गलती नहीं हो सकती। सरकारी दवाइयों की खरीद, भंडारण, परिवहन और वितरण की एक पूरी प्रक्रिया होती है। हर स्तर पर रिकॉर्ड रखा जाता है। किस अस्पताल को कितनी दवा भेजी गई, किस गोदाम में कितना स्टॉक रखा गया, कौन अधिकारी इसकी निगरानी कर रहा था—इन सबका स्पष्ट विवरण मौजूद होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयाँ जंगल तक पहुंचीं कैसे? क्या ये दवाइयाँ एक्सपायर हो चुकी थीं? यदि हाँ, तो उन्हें वैज्ञानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत नष्ट क्यों नहीं किया गया? यदि दवाइयाँ उपयोग योग्य थीं, तो उन्हें मरीजों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया? इन सवालों का जवाब केवल प्रशासनिक जांच से नहीं बल्कि पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई से ही मिल सकता है।

यह घटना झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की उन कमियों को भी उजागर करती है, जिनकी चर्चा वर्षों से होती रही है। राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। नए अस्पताल बने, योजनाएँ शुरू हुईं, दवा खरीद के लिए बजट बढ़ाया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी है। कई अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं। आधुनिक उपकरणों का अभाव है। दवाओं की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पाती। ऐसे में जंगल में फेंकी गई दवाइयाँ केवल एक घटना नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रतीक बन जाती हैं।

इस मामले का दूसरा पहलू राजनीतिक और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल सरकार की आलोचना करना नहीं बल्कि जनता के मुद्दों को उठाना भी होता है। जब कोई जनप्रतिनिधि या पत्रकार ऐसे मामलों को सामने लाता है, तो सरकार का पहला कर्तव्य होना चाहिए कि वह तथ्यों की जांच करे और दोषियों पर कार्रवाई करे। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब पैदा होती है जब सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाती है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं है। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके टैक्स के पैसे का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है।
राजनीति

स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर मरीजों के लिए खरीदी गई दवाइयाँ जंगल में कैसे पहुंच गईं। यदि यह लापरवाही थी तो जिम्मेदार कौन है? यदि इसमें भ्रष्टाचार की भूमिका है तो उसके पीछे कौन लोग हैं? क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई करके मामले को समाप्त कर दिया जाएगा या फिर पूरे नेटवर्क की जांच होगी? जनता इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर चाहती है।

यह भी समझना आवश्यक है कि स्वास्थ्य सेवा केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि मानव जीवन से जुड़ा विषय है। किसी गरीब मरीज के लिए अस्पताल में मिलने वाली मुफ्त दवा जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकती है। जब दवाइयाँ नष्ट होती हैं या फेंकी जाती हैं, तब केवल सरकारी धन की बर्बादी नहीं होती बल्कि उन मरीजों की उम्मीदें भी खत्म हो जाती हैं जो उपचार के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर हैं। इसलिए इस घटना को केवल प्रशासनिक त्रुटि मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ बड़ी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर है, स्वास्थ्य सेवाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोग सरकारी अस्पतालों और सरकारी दवाओं पर निर्भर हैं। उनके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था केवल सुविधा नहीं बल्कि जीवन रेखा है। यदि उसी व्यवस्था में इस प्रकार की अनियमितताएँ सामने आती हैं तो इसका सीधा असर समाज के सबसे कमजोर वर्ग पर पड़ता है।

आज आवश्यकता केवल जांच समिति गठित करने की नहीं है। आवश्यकता है कि पूरे राज्य में दवा खरीद, भंडारण और वितरण प्रणाली का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि हर दवा का हिसाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली को मजबूत बनाया जाए ताकि यह पता चल सके कि कौन-सी दवा किस अस्पताल तक पहुंची और उसका उपयोग कहाँ हुआ। साथ ही दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो भविष्य में किसी अन्य व्यक्ति को इस प्रकार की लापरवाही करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर कर दे।

मुख्यमंत्री और राज्य सरकार के लिए यह घटना एक चेतावनी है। यदि इस मामले में पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि गरीबों के अधिकारों और जनता के पैसे की कोई कीमत नहीं है। सरकार की विश्वसनीयता केवल घोषणाओं और विज्ञापनों से नहीं बल्कि ऐसी घटनाओं पर उसकी कार्रवाई से तय होती है।

मनिका के जंगल में पड़ी दवाइयाँ केवल कुछ डिब्बे और शीशियाँ नहीं हैं। वे उस गरीब मरीज की उम्मीद हैं जो अस्पताल के बाहर दवा के लिए लाइन में खड़ा रहता है। वे उस किसान और मजदूर के टैक्स का पैसा हैं जिसने अपनी कमाई का हिस्सा सरकार को दिया। वे शासन की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की परीक्षा हैं। इसलिए इस घटना को भूल जाना या दबा देना आसान हो सकता है, लेकिन इससे पैदा हुए सवालों को दबाया नहीं जा सकता।

जब तक हर दवा जरूरतमंद मरीज तक नहीं पहुंचती, जब तक हर रुपये का हिसाब नहीं मिलता और जब तक दोषियों को दंड नहीं मिलता, तब तक मनिका के जंगल में बिखरी ये दवाइयाँ झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगे उस कलंक की याद दिलाती रहेंगी, जिसे केवल शब्दों से नहीं बल्कि कठोर और ईमानदार कार्रवाई से ही मिटाया जा सकता है।

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