September 25, 2026

जमुई नाबालिग की तस्वीर विवाद पर तेजस्वी ने CM सम्राट चौधरी के खिलाफ सजा की मांग की, जानिए POCSO के कड़े प्रावधान

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नई दिल्ली ।बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से जुड़े एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि जमुई की एक नाबालिग पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात के दौरान ली गई तस्वीर को इस तरह सार्वजनिक किया गया, जिससे बच्ची की पहचान उजागर होने की स्थिति बनी। विवाद सामने आने के बाद पोस्ट को हटा दिया गया। इस मामले को लेकर विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई और सजा की मांग की गई है।

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मामले में पॉक्सो यानी बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले कानून का हवाला दिया है। उनका कहना है कि नाबालिग पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना कानून के प्रावधानों के दायरे में आता है और इसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी दोष सिद्ध होना जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

दरअसल, जमुई जिले में 19 सितंबर को दसवीं कक्षा की एक नाबालिग छात्रा और उसके दोस्त के साथ युवकों द्वारा कथित तौर पर छेड़खानी और बदसलूकी की घटना सामने आई थी। घटना से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ था। मामले ने कानून-व्यवस्था और नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए।

इसी मामले के बाद मुख्यमंत्री ने पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद जारी किए गए पोस्ट में बच्ची और उसके परिवार को न्याय का भरोसा दिलाने की बात कही गई थी। पोस्ट में यह भी कहा गया था कि मामले में दोषियों के खिलाफ स्पीडी ट्रायल के जरिए एक महीने के भीतर कठोर सजा सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी। विवाद इस बात को लेकर हुआ कि पोस्ट में पीड़िता की पहचान छिपाने के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे।

POCSO कानून वर्ष 2012 में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसके तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को संरक्षण दिया जाता है। कानून में बच्चों के खिलाफ होने वाले विभिन्न यौन अपराधों की पहचान, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनके हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

इस कानून में नाबालिग पीड़ित या पीड़िता की पहचान और निजता को लेकर भी विशेष सुरक्षा दी गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे को कानूनी कार्रवाई के दौरान ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े, जिससे उसकी पहचान सार्वजनिक हो या उसकी गरिमा प्रभावित हो।

POCSO की धारा 23 इसी विषय से संबंधित है। इसके तहत बच्चे से जुड़े मामले की रिपोर्टिंग या टिप्पणी करते समय उसकी निजता और सम्मान का ध्यान रखना जरूरी है। ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने पर रोक है, जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती है।

पहचान के दायरे में बच्चे का नाम, पता, तस्वीर, परिवार से जुड़ी जानकारी, स्कूल, पड़ोस या ऐसी कोई अन्य जानकारी शामिल हो सकती है, जिससे उसकी पहचान का पता लगाया जा सके। कानून का उद्देश्य विशेष रूप से यह है कि यौन अपराध से प्रभावित बच्चे की पहचान सार्वजनिक न हो और उसकी निजता सुरक्षित रहे।

धारा 23 के प्रावधानों के उल्लंघन पर छह महीने से एक वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है। हालांकि किसी विशेष मामले में यह धारा लागू होती है या नहीं, यह संबंधित तथ्यों, जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय किया जाता है।

जमुई मामले में तस्वीर को लेकर उठे विवाद के बाद अब मुख्य मुद्दा यही है कि नाबालिग की पहचान सार्वजनिक होने के आरोप की कानूनी जांच किस तरह आगे बढ़ती है। राजनीतिक स्तर पर इस मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, जबकि कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकता है।

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