March 9, 2026

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कहा- प्रावधान अस्पष्ट, गलत इस्तेमाल की आशंका

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नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की पीठ ने कहा कि नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है और इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए नियमों का नया ड्राफ्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिनमें आरोप लगाया गया है कि UGC के नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। UGC ने 13 जनवरी को इन नियमों को अधिसूचित किया था, जिसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध देखने को मिला।

क्या हैं UGC के नए नियम

UGC के इन नियमों का नाम ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ है। इनके तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

नियमों के अनुसार, संस्थानों में विशेष शिकायत समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें गठित की जानी हैं, जो SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी शिकायतों की निगरानी करेंगी। सरकार का तर्क है कि इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।

जनरल कैटेगरी के छात्रों की आपत्ति

वहीं, जनरल कैटेगरी के छात्रों का कहना है कि नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा एकतरफा है। उनका आरोप है कि नए प्रावधानों में सवर्ण छात्रों को पहले से ही दोषी मान लिया गया है और उनके साथ होने वाले भेदभाव के लिए कोई शिकायत तंत्र उपलब्ध नहीं कराया गया है। इससे शिक्षण संस्थानों में भ्रम और अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि यदि कोई शिकायत झूठी साबित होती है, तो गलत आरोप लगाने वालों पर भी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि इस मामले में समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो इसके समाज पर गंभीर और दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों द्वारा इसकी समीक्षा जरूरी है ताकि इनका दुरुपयोग न हो सके।

चीफ जस्टिस ने उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग राज्यों और संस्कृतियों से आने वाले छात्रों के बीच सामान्य टिप्पणियां भी विवाद का कारण बन सकती हैं। ऐसे मामलों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि समाधान किस नियम के तहत होगा। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि क्या ऐसे नियम समाज को वर्गहीन बनाने के बजाय पीछे की ओर ले जा सकते हैं।

संवैधानिक समानता का मुद्दा

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि नियमों का सेक्शन 3(सी) संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें केवल SC, ST और OBC को ही संरक्षण दिया गया है और जनरल कैटेगरी को इससे बाहर रखा गया है। उनका कहना था कि किसी एक वर्ग को पहले से अपराधी मान लेना और उसे शिकायत का अधिकार न देना संवैधानिक समानता के खिलाफ है। अब इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी, जिसमें केंद्र और UGC को अपना पक्ष रखना होगा।

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