March 8, 2026

सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में पेश किया निजी संकल्प, सभी सांसदों ने प्रस्ताव को दिया समर्थन

0

नई दिल्‍ली । राज्यसभा(Rajya Sabha) में शुक्रवार को उस समय एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम सांसद(Member of Parliament) एकसाथ खड़े नजर आए। विभिन्न दलों के सदस्यों ने मनोनीत सदस्य सुधा मूर्ति के एक निजी संकल्प की सराहना की, जिसमें उन्होंने तीन से छह साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा और पोषण गारंटी का प्रस्ताव दिया था। सुधा मूर्ति ने एक निजी संकल्प पेश करते हुए कहा कि एक शिक्षित माता अर्थव्यवस्था में अपना विशेष योगदान देती है। उन्होंने यह भी कहा कि गर्भवर्ती महिलाओं(Pregnant women) और स्तनपान कराने वाली माताओं को सही पोषण देने से बच्चों का समुचित शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है। संकल्प में छोटे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और प्री-प्राइमरी(Pre-primary) शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं शामिल किए जाने का भी संकल्प है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। प्रस्ताव का समर्थन करते हुए डीएमके के पी. विल्सन ने कहा, 12वीं तक की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। आप की स्वाति मालीवाल ने भी इसका समर्थन किया।

सुधा मूर्ति के निजी संकल्प में प्रावधान किया गया है कि तीन से छह वर्ष के सभी बच्चों के लिए पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, प्री प्राइमरी शिक्षा सहित निशुल्क एवं अनिवार्य प्रारंभिक बाल्यवस्था एवं प्रारंभिक शिक्षा की गारंटी देने के लिए संविधान में एक नवीन अनुच्छेद अत:स्थापित करने पर विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि तीन से छह वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास समुचित ढंग से होना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई बार बच्चे के अभिभावक इतने शिक्षित और जानकार नहीं होते कि वे इस पक्ष की ओर ध्यान दे पायें।

मनोनीत सदस्य ने कहा कि यदि इस आयु में बच्चों को आंगनवाड़ी भेज कर उन्हें समुचित पोषण और शिक्षा दी जाये तो उन्हें आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बनाने और साफ-सफाई का ध्यान रखने आदि के अच्छे गुण सिखाये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे केंद्रों पर बच्चा जाता है तो उसके अंदर विभिन्न शारीरिक कमियों जैसे देखने, बोलने की क्षमता में कमी और कुपोषण से होने वाली समस्याओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है क्योंकि वहां बच्चों की समय समय पर जांच होती है।

मूर्ति ने सुझाव दिया कि जिस तरह से सरकार ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ का अभियान छेड़ा है ठीक उसी तरह तीन से छह साल तक के बच्चों को आंगनवाड़ी में भेजने के लिए अभियान चलाया जाए। उन्होंने कहा कि इस काम में निगमित दायित्व कोष (सीएसआर) की भी मदद ली जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘यदि हमें अपने देश को विकसित राष्ट्र बनाना है तो हमें अपने बच्चों की तीन से छह वर्ष की आयु में विकास पर ध्यान देना होगा।’’

उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने जब इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की और जब जमशेदपुर में टाटा की नौकरी का विज्ञापन देखा जिसमें लिखा था कि इसमें महिलाएं आवेदन नहीं करें। उन्होंने जे आर डी टाटा को एक पोस्टकार्ड लिखकर कहा कि उनकी कंपनी देश की आधी आबादी से अवसर क्यों छीन रहीं है क्योंकि देश के विकास में आधी आबादी को भी भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए।

मूर्ति ने कहा कि यह जेआरडी टाटा की महानता थी कि उन्होंने एक अपरिचित लड़की का सुझाव मानते हुए लड़कियों अपने यहां काम करने का अवसर दिया।

भारतीय जनता पार्टी की मेधा विश्राम कुलकर्णी ने कहा कि वह मूर्ति द्वारा आंगनवाड़ी को सशक्त बनाने के लिए लाये गये इस प्रस्ताव का समर्थन करती हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा की ओर से वह देश के विभिन्न भागों में आंगनवाड़ी के कामकाज देखने गयी थीं और उन्हें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अधिकतर राज्यों में आंगनवाड़ी में बहुत अच्छा कामकाज होता है।

कुलकर्णी ने कहा कि कोविड के दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जितना काम किया, जितनी चिकित्सकों की सहायता की, घर-घर जाकर रोगियों के बारे में जानकारी ली, वैसा कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी की कक्षाएं चलाने के लिए ऐसी कार्यकर्ताओं को अधिक कोष दिया जाना चाहिए।

चर्चा में भाग लेते हुए द्रमुक के पी विल्सन ने तमिलनाडु में स्कूली शिक्षा के लिए केंद्र द्वारा दिया जाने वाला धन रोके जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने शिक्षा अर्हता परीक्षा को अनिवार्य बनाये जाने के नियम का विरोध करते हुए कहा कि इससे देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बड़ी कमी होने की आशंका है।

आम आदमी पार्टी की स्वाति मालीवाल् ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि जापान सहित विभिन्न देशों में तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास पर बहुत ध्यान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आज भारत में शिक्षा का विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है लेकिन इनकी गुणवत्ता में काफी अंतर है।

उन्होंने कहा कि आज तीन से छह वर्ष के बच्चों के विकास के लिए गली गली में प्ले स्कूल हैं जो केवल अमीर एवं मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए ही खुले हैं। उन्होंने कहा कि गरीब एवं वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र होते है किंतु उनकी कार्यकर्ताओं पर इतना बोझ होता है कि वे बच्चों के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दे पातीं।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *