October 15, 2026

मौसम का बिगड़ता मिजाज बढ़ाएगा मुश्किलें, अल नीनो से बारिश और तापमान पर असर की आशंका, खाद्य कीमतों पर रहेगी नजर

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नई दिल्ली।
भारत में अल नीनो को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। विश्व मौसम संगठन यानी डब्ल्यूएमओ के ताजा अनुमान के मुताबिक प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने की यह स्थिति फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है। इसका असर भारत के मौसम और कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। मौसम में बदलाव के कारण सर्दियों की बारिश और तापमान प्रभावित हो सकते हैं। इसके साथ ही आने वाले महीनों में फसलों की पैदावार और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी नजर रखनी होगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो के प्रभाव का वास्तविक आकलन करने के लिए मौसम के ताजा आंकड़ों और अगले मानसून के पूर्वानुमान को समझना जरूरी होगा।
विश्व मौसम संगठन के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बना हुआ है।

रिपोर्ट में दिसंबर के आसपास इसके चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है। कुछ अनुमानों में तापमान सामान्य से करीब चार डिग्री सेल्सियस तक अधिक होने की आशंका व्यक्त की गई है। यदि ऐसा होता है तो अल नीनो की स्थिति मजबूत हो सकती है। इससे पहले 2015 में भी इस जलवायु घटना का प्रभाव काफी व्यापक रहा था। नए अनुमान में तापमान के चरम पर पहुंचने का समय नवंबर से बढ़ाकर दिसंबर बताया गया है। ऐसे में आशंका है कि इसका प्रभाव फरवरी 2027 के बाद भी कुछ समय तक बना रह सकता है।

अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है। भारत में इसका संबंध अक्सर मानसूनी बारिश में बदलाव से जोड़ा जाता है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में भारत में सूखा पड़े या बारिश सामान्य से कम हो ऐसा जरूरी नहीं है। इसका असर अन्य मौसमी परिस्थितियों और समुद्र तथा वायुमंडल के बीच होने वाली गतिविधियों पर भी निर्भर करता है। इसलिए अगले मानसून की स्थिति को लेकर अभी से किसी निश्चित नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

इस बीच कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस साल मानसूनी बारिश सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही और धान की बुवाई का क्षेत्र करीब 17 लाख हेक्टेयर घटा है। इसके चलते धान उत्पादन में लगभग 70 लाख टन की कमी आने का अनुमान जताया गया है। भारत में चावल प्रमुख खाद्यान्नों में शामिल है और देश में इसकी खपत के मुकाबले उत्पादन आम तौर पर अधिक रहता है। ऐसे में उत्पादन में गिरावट का वास्तविक असर घरेलू आपूर्ति और बाजार कीमतों पर निर्भर करेगा। यदि उपलब्धता प्रभावित होती है तो चावल समेत कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि उत्पादन में अनुमानित कमी का मतलब यह नहीं है कि देश में अनाज की तत्काल कमी हो जाएगी।

मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. केजे रमेश के अनुसार अल नीनो का मिश्रित प्रभाव मानसून पर देखा गया है और धान की बुवाई में कमी आई है। उनका कहना है कि जितनी गंभीर आशंका जताई जा रही थी उतना प्रतिकूल असर सामने नहीं आया। उन्होंने फरवरी और मार्च तक परिस्थितियां सामान्य होने की उम्मीद जताई है। सर्दियों की बारिश के संबंध में भी कुछ पूर्वानुमानों में सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना बताई गई है। इससे साफ है कि अल नीनो के प्रभाव का आकलन करते समय सभी मौसमी संकेतों को साथ लेकर चलना होगा।

जलवायु परिवर्तन का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है बल्कि इसका व्यापक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक रिपोर्ट में तापमान बढ़ने से भारत की आर्थिक वृद्धि को होने वाले संभावित नुकसान की ओर ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक अत्यधिक गर्मी से कृषि उत्पादकता और औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। इससे रोजगार और आर्थिक विकास की गति पर दबाव पड़ने की आशंका है। रिपोर्ट में जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए निवेश बढ़ाने की जरूरत भी बताई गई है। आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति और फसल उत्पादन के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे। किसानों के लिए बेहतर मौसम पूर्वानुमान जल प्रबंधन और कृषि संबंधी तैयारी इस चुनौती से निपटने में मददगार साबित हो सकती है।

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