बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर रद्द की शिंदे समर्थक की जमानत, आपराधिक रिकॉर्ड को किया रेखांकित
नई दिल्ली । चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर न्यायपालिका ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। मुंबई के डोंबिवली स्थित एक सरकारी अस्पताल में महिला डॉक्टर से कथित बदसलूकी और मारपीट के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपी शिवसेना नेता रमेश म्हात्रे को निचली अदालत से मिली जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने आरोपी को 20 जुलाई 2026 तक संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। इस फैसले को डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा के मामलों में न्यायपालिका के कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
मामला उस समय सामने आया जब डोंबिवली के सरकारी अस्पताल में भर्ती के लिए पहुंचे एक मरीज को तत्काल बेड उपलब्ध कराने की मांग को लेकर विवाद हो गया। ड्यूटी पर मौजूद महिला डॉक्टर ने अस्पताल के नियमों और बेड की उपलब्धता का हवाला देते हुए तत्काल व्यवस्था करने में असमर्थता जताई। आरोप है कि इसी बात से नाराज होकर रमेश म्हात्रे ने डॉक्टर के साथ अभद्र व्यवहार किया और उनके साथ मारपीट की। घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया और पुलिस ने डॉक्टर की शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया। बाद में स्थानीय अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी थी।
निचली अदालत के इस फैसले के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए जमानत आदेश पर गंभीर आपत्ति जताई। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय किसी भी आरोपी के आपराधिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कुछ मामलों में आरोपी को राहत मिली हो, लेकिन उसके विरुद्ध दर्ज मामलों की प्रकृति और संख्या पर विचार करना आवश्यक है। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में न्यायिक विवेक का उपयोग पूरी सावधानी और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर और अन्य चिकित्सा कर्मी समाज को आवश्यक सेवाएं प्रदान करते हैं तथा ड्यूटी के दौरान उनके साथ हिंसा या अभद्रता किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने टिप्पणी की कि अस्पतालों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय है और इस प्रकार की घटनाओं पर कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने आरोपी को निर्धारित समय सीमा के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी व्यक्ति की सामाजिक या राजनीतिक पहचान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकती।
इस घटनाक्रम के बाद डॉक्टर संगठनों में भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। पहले जमानत दिए जाने के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन और हड़ताल की घोषणा की गई थी। हालांकि हाई कोर्ट के फैसले के बाद अदालत ने डॉक्टर समुदाय से अपील की कि वे अपने प्रस्तावित आंदोलन पर पुनर्विचार करें और स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित होने से बचाएं। चिकित्सा समुदाय का कहना है कि अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था और सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है, ताकि वे बिना किसी भय के मरीजों की सेवा कर सकें।
