डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण जल्द हो सकता है अनिवार्य, ऊर्जा सुरक्षा और हरित ईंधन की दिशा में बड़ा कदम
नई दिल्ली । देश की ऊर्जा नीति और परिवहन क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव जल्द देखने को मिल सकता है। सरकार इस साल के भीतर डीजल में आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग यानी मिश्रण को अनिवार्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और परिवहन क्षेत्र को धीरे-धीरे कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करना है।
एक उद्योग सम्मेलन में बोलते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग सचिव वी. उमाशंकर ने संकेत दिया कि डीजल ब्लेंडिंग को लेकर गंभीरता से काम चल रहा है और इसके नतीजे उत्साहजनक पाए गए हैं। उन्होंने बताया कि भारत पेट्रोलियम जैसे संस्थान इस तकनीक पर रणनीतिक शोध कर रहे हैं और शुरुआती परीक्षणों में सकारात्मक परिणाम मिले हैं। संभावना जताई जा रही है कि वर्ष के अंत तक इस नीति को अनिवार्य रूप से लागू किया जा सकता है।
भारत में डीजल की खपत पेट्रोल की तुलना में लगभग दोगुनी है, ऐसे में इस बदलाव को ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डीजल में जैव-ईंधन आधारित मिश्रण को बढ़ावा दिया जाता है तो इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी बल्कि पर्यावरणीय प्रदूषण में भी कमी आएगी।
सरकार केवल ईंधन मिश्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह आधुनिक और कम उत्सर्जन वाली बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसी क्रम में इलेक्ट्रिक भारी वाहनों के लिए बैटरी स्वैपिंग और चार्जिंग नेटवर्क विकसित करने की योजना पर तेजी से काम चल रहा है। मंत्रालय जल्द ही ट्रक-ट्रेलर से जुड़ा एक नया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर सकता है, जिससे लॉजिस्टिक्स सेक्टर को अधिक कुशल बनाया जा सकेगा।
अधिकारियों के अनुसार लंबे समय तक ट्रकों को चार्जिंग के लिए रोकना व्यावहारिक नहीं है, इसलिए बैटरी स्वैपिंग और वैकल्पिक मॉडल पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही ट्रैक्टर-ट्रेलर इंटरचेंज मॉडल पर भी विचार किया जा रहा है, जिसमें ट्रक का अगला हिस्सा बदला जा सकेगा जबकि कंटेनर और ट्रेलर अलग रहेंगे।
हाइड्रोजन आधारित परिवहन व्यवस्था पर भी सरकार पायलट प्रोजेक्ट के जरिए प्रयोग कर रही है। दिल्ली में शुरू की गई हाइड्रोजन बसें इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही हैं। इन बसों की क्षमता एक बार ईंधन भरने पर लगभग 450 किलोमीटर तक चलने की बताई गई है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में प्रमुख राष्ट्रीय कॉरिडोर पर सीमित संख्या में हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन स्थापित कर बड़े स्तर पर संचालन संभव हो सकता है।
इसके अलावा मंत्रालय मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग सिस्टम को भी तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जिससे टोल प्लाजा पर रुकने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। यह प्रणाली अगले वर्ष तक देशभर के बड़े टोल प्लाजा पर लागू किए जाने की योजना में है। साथ ही दिल्ली-एनसीआर के लिए एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम को भी मंजूरी मिल चुकी है, जिससे यातायात को अधिक सुचारू और तेज बनाया जा सकेगा।
इन सभी पहलों से स्पष्ट है कि सरकार परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र में एक व्यापक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसका असर आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था, प्रदूषण नियंत्रण और लॉजिस्टिक्स दक्षता पर दिखाई देगा।
