एनएसई आईपीओ से पहले इक्विटी ऑप्शंस में मार्केट शेयर घटा, सख्त डेरिवेटिव्स नियमों से कारोबार और मुनाफे पर बढ़ा दबाव
एनएसई की ओर से रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में दी गई जानकारी के अनुसार, इक्विटी ऑप्शंस के प्रीमियम वैल्यू सेगमेंट में उसकी बाजार हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2023-24 में 96.9 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2024-25 में यह घटकर 87.4 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2025-26 में 74.71 प्रतिशत रह गई।
इस तरह तीन वित्त वर्षों में इक्विटी ऑप्शंस के प्रीमियम वैल्यू सेगमेंट में एनएसई की बाजार हिस्सेदारी 22.2 प्रतिशत कम हुई है। हालांकि, अन्य सेगमेंट में एक्सचेंज की स्थिति मजबूत बनी हुई है।
कैश इक्विटी सेगमेंट इसका प्रमुख उदाहरण है। वित्त वर्ष 2023-24 में इस सेगमेंट में एनएसई की बाजार हिस्सेदारी 92.7 प्रतिशत थी। अगले वित्त वर्ष में यह बढ़कर 93.6 प्रतिशत हुई और वित्त वर्ष 2025-26 में 92.99 प्रतिशत रही।
कैश सेगमेंट में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी एनएसई की मजबूत स्थिति को दर्शाती है। हालांकि, इतनी ऊंची हिस्सेदारी होने के कारण इस क्षेत्र में आगे बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है। इसलिए ऑप्शंस और डेरिवेटिव्स कारोबार में होने वाले बदलाव एनएसई के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
डेरिवेटिव्स कारोबार पर सख्त होते नियम भी एक्सचेंज के लिए चुनौती बढ़ा रहे हैं। निवेशकों को इस सेगमेंट में हुए बड़े नुकसान के बाद पिछले कुछ वर्षों में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी बढ़ाना और मार्जिन से जुड़े कदम शामिल हैं।
इसके साथ ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी की ओर से भी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से जुड़े जोखिमों को लेकर निवेशकों में जागरूकता बढ़ाई जा रही है। इन उपायों का उद्देश्य डेरिवेटिव्स कारोबार में निवेशकों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
खुदरा निवेशकों की संख्या में आई गिरावट भी इसी चुनौती को सामने रखती है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी की ओर से राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, एफएंडओ सेगमेंट में विशिष्ट खुदरा निवेशकों की संख्या वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 20 प्रतिशत घटकर 78.6 लाख रह गई। वित्त वर्ष 2024-25 में यह संख्या 98.1 लाख थी।
खुदरा निवेशकों की संख्या घटने से एफएंडओ बाजार की गतिविधियों और वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि एनएसई ने अपने आरएचपी में खुद इस जोखिम का उल्लेख किया है।
एनएसई के अनुसार, डेरिवेटिव्स, खासकर एफएंडओ बाजार में वॉल्यूम में कमी आने से उसके कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वॉल्यूम घटने का असर आगे उसके मुनाफे पर भी पड़ सकता है।
इस तरह एनएसई के सामने चुनौती का मुख्य कारण इक्विटी ऑप्शंस में घटती हिस्सेदारी और डेरिवेटिव्स कारोबार को नियंत्रित करने वाले सख्त होते नियम हैं। इसका संभावित असर एफएंडओ गतिविधियों और वॉल्यूम में कमी के रूप में सामने आ सकता है, जिससे कारोबार और मुनाफे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
आईपीओ से पहले एनएसई की कैश इक्विटी में मजबूत पकड़ बनी हुई है, लेकिन इक्विटी ऑप्शंस में बाजार हिस्सेदारी की गिरावट और डेरिवेटिव्स कारोबार से जुड़े नियामकीय बदलाव एक्सचेंज के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी चुनौतियां बने हुए हैं।
