आरबीआई की विशेष योजना से विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत, एफसीएनआर (बी) जमा में सार्वजनिक बैंकों की अहम भूमिका
17 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग 20 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया है। इसमें 17.4 अरब डॉलर का योगदान केवल एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट से आया है। यह संकेत देता है कि विशेष योजना को प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा निवेशकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि जमा में आई यह तेजी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, अगस्त और सितंबर 2026 के दौरान परिपक्व होने वाली बड़ी संख्या में मौजूदा एफसीएनआर (बी) जमाओं का नवीनीकरण होने की संभावना है। विशेष योजना के तहत उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक ब्याज दरें जमाकर्ताओं को अपनी राशि दोबारा निवेश करने के लिए आकर्षित कर सकती हैं। इससे कुल जमा राशि में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि मौजूदा आधारभूत अनुमान के अतिरिक्त लगभग 10 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी भी देश में आ सकती है। यह अतिरिक्त निवेश मुख्य रूप से उन देशों से आने की संभावना है जहां कर संबंधी रियायतें उपलब्ध हैं और प्रवासी भारतीयों की अच्छी संख्या मौजूद है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो विदेशी मुद्रा प्रवाह अपेक्षा से अधिक मजबूत हो सकता है।
एफसीएनआर (बी) जमा अभियान को आगे बढ़ाने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन बैंकों ने न केवल अपने व्यापक ग्राहक आधार का लाभ उठाया है, बल्कि विभिन्न देशों में रहने वाले भरोसेमंद और उच्च साख वाले ग्राहकों के साथ लंबे समय से बने संबंधों का भी प्रभावी उपयोग किया है। इसके साथ ही ऑनशोर और ऑफशोर बैंकिंग रणनीतियों के संतुलित उपयोग ने भी पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को गति दी है।
हालांकि मजबूत पूंजी प्रवाह के बावजूद विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ सवाल भी बने हुए हैं। वित्तीय बाजारों में यह चर्चा जारी है कि इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने के बाद भी रुपये पर दबाव क्यों बना हुआ है और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की स्थिति पर इसका वास्तविक प्रभाव किस प्रकार दिखाई देगा। यह विषय आने वाले समय में नीति निर्माताओं और बाजार विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण बना रह सकता है।
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप पूरी तरह नियमित नहीं रहा। इसके बावजूद यह आवश्यक माना गया है कि रुपये की मूलभूत मजबूती को बनाए रखा जाए, ताकि वह वैश्विक आर्थिक झटकों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके और भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर प्रतिकूल असर न पड़े। वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ते तनाव और असंतुलित पूंजी प्रवाह के दौर में विदेशी मुद्रा प्रबंधन और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
