April 30, 2026

मई में कब रखा जाएगा वट सावित्री व्रत 2026, पूजन विधि से लेकर सामग्री तक सबकुछ यहां जानें

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नई दिल्ली । हिंदू धर्म में ज्येष्ठ माह का विशेष महत्व माना जाता है और इसी महीने में आने वाला वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण होता है यह व्रत पति की लंबी आयु सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और माता सावित्री का स्मरण करती हैं जिन्होंने अपने तप और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाएगा इस बार अमावस्या तिथि 16 मई शनिवार को सुबह 5 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर देर रात 1 बजकर 31 मिनट तक रहेगी उदयातिथि के आधार पर व्रत 16 मई को ही रखा जाएगा इस दिन शनिवार होने के कारण शनि अमावस्या का विशेष संयोग भी बन रहा है जिससे इस व्रत का महत्व और अधिक बढ़ जाता है

पूजन के लिए अभिजीत मुहूर्त को अत्यंत शुभ माना गया है इस दिन सुबह 11 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 44 मिनट तक का समय पूजा के लिए श्रेष्ठ रहेगा इस समय में विधिपूर्वक वट वृक्ष की पूजा करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है

वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं इसके बाद सोलह श्रृंगार कर व्रत का संकल्प लिया जाता है महिलाएं वट वृक्ष के पास जाकर पूजा करती हैं और जल अक्षत तिल फूल और सिंदूर अर्पित करती हैं इसके साथ ही कच्चे सूत को वट वृक्ष के चारों ओर लपेटते हुए उसकी परिक्रमा की जाती है यह परिक्रमा सात इक्कीस या एक सौ आठ बार की जा सकती है

पूजा के दौरान वट सावित्री व्रत कथा का पाठ करना भी आवश्यक माना गया है कथा के माध्यम से माता सावित्री के अद्भुत साहस और पतिव्रता धर्म का स्मरण किया जाता है इसके बाद महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना करती हैं

पूजन सामग्री में तांबे का लोटा गंगाजल सिंदूर रोली कलावा कच्चा सूत अगरबत्ती दीपक फूल तिल अक्षत फल मिठाई और अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल होती हैं पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं को विशेष रूप से वर वधू के प्रतीक स्वरूप वस्त्र भी रखने होते हैं

धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों का वास होता है इसलिए इसकी पूजा करने से त्रिदेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है यह व्रत केवल परंपरा नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम विश्वास और समर्पण का प्रतीक भी है जो परिवार में सुख शांति और समृद्धि लाने का संदेश देता है

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