September 16, 2026

Sheetla Ashtami 2026: आरोग्यता की देवी माँ शीतला को क्यों प्रिय है 'ठंडा प्रसाद'? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और परंपराएं।

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नई दिल्ली :सनातन परंपरा में चैत्र मास केवल एक कैलेंडर का महीना नहीं, बल्कि यह नई ऊर्जा, नववर्ष के उल्लास और प्रकृति के श्रृंगार का समय है। इसी पावन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘बसोड़ा’ या ‘शीतला अष्टमी’ का पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से “आरोग्यता” और “स्वच्छता” की अधिष्ठात्री देवी “माँ शीतला” को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ शीतला का स्वरूप अत्यंत शीतल है और वे अपने भक्तों को चेचक, खसरा और ज्वर जैसी बीमारियों से मुक्त रखती हैं।

वर्ष 2026 में बसोड़ा का पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, अष्टमी तिथि 11 मार्च की मध्य रात्रि 01:54 बजे से प्रारंभ होकर 12 मार्च की सुबह 04:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि की महत्ता के कारण 11 मार्च को ही मुख्य पूजन संपन्न होगा। इस दिन भक्तों के लिए पूजन का “शुभ मुहूर्त” सुबह 06:35 से शाम 06:27 तक रहेगा, जो साधना और संकल्प के लिए अत्यंत श्रेयस्कर है।

बसोड़ा की सबसे विशिष्ट और अनूठी परंपरा है “बासी भोजन” का भोग। इस पर्व के नाम ‘बसोड़ा’ का अर्थ ही ‘बासी’ से जुड़ा है। लोक परंपरा के अनुसार, इस दिन घर में चूल्हा जलाना पूरी तरह वर्जित माना गया है। अग्नि को “ताप” और “उष्णता” का प्रतीक माना जाता है, जो शीतलता की देवी माँ शीतला के स्वभाव के विपरीत है। इसलिए, अष्टमी से एक दिन पहले यानी “सप्तमी” की शाम को ही विशेष पकवान जैसे मीठे चावल (ओलिया), राबड़ी, दही, पुए, और परांठे तैयार कर लिए जाते हैं। अष्टमी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद, इन्हीं ठंडे पकवानों का भोग माता को लगाया जाता है और परिवार के सभी सदस्य इसी ‘ठंडे प्रसाद’ को ग्रहण करते हैं।

इस परंपरा के पीछे गहरा “वैज्ञानिक तर्क” भी छिपा है। चैत्र मास वह समय होता है जब सर्दियाँ विदा हो रही होती हैं और गर्मियों का आगमन होता है। ऋतु परिवर्तन के इस संधिकाल में शरीर में पित्त और गर्मी बढ़ने की आशंका रहती है। आयुर्वेद और लोक मान्यताओं के अनुसार, शीतल भोजन ग्रहण करना शरीर को आने वाली भीषण गर्मी के लिए तैयार करने और पाचन तंत्र को संतुलित रखने का एक माध्यम है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि अब से ताजे और ठंडे भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

पूजा की विधि भी उतनी ही सरल और भावपूर्ण है। भक्त सुबह स्वच्छ वस्त्र धारण कर हाथ में जल लेकर परिवार की “सुख-शांति” और रोगों से मुक्ति का संकल्प लेते हैं। माता की प्रतिमा को हल्दी, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजन के बाद माता के चरणों में अर्पित किए गए जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस जल को पूरे घर में छिड़कने की परंपरा है, जिससे घर की “नकारात्मक ऊर्जा” नष्ट होती है और वातावरण शुद्ध होता है। संक्षेप में, बसोड़ा का यह पर्व हमें अनुशासन, स्वच्छता और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

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