कोटेश्वर महादेव मंदिर में सावन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़, लेटे शिवलिंग की अनूठी मान्यता बनी आकर्षण
इस प्राचीन मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता यहां विराजित शिवलिंग का स्वरूप है। प्रचलित पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान शिव विश्राम की स्थिति में यानी लेटी हुई मुद्रा में स्थापित हैं। यह दुर्लभ स्वरूप इसे देश के अन्य तमाम पारंपरिक शिव धामों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। श्रद्धालुओं के बीच यह अटूट विश्वास है कि भगवान आशुतोष का यह लेटा हुआ स्वरूप अत्यंत चमत्कारिक और फलदायी है, जहां केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
मंदिर से जुड़ी एक और बेहद चर्चित और गहरी मान्यता यह है कि यहां मौजूद शिवलिंग प्रतिवर्ष जौ के एक दाने के बराबर स्वयं बढ़ता जाता है। स्थानीय निवासियों और मंदिर के पुजारियों का मानना है कि यह वृद्धि भगवान शिव की प्रत्यक्ष दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। यद्यपि यह पूर्ण रूप से जनआस्था और धार्मिक विश्वास का विषय है, लेकिन इसी कौतूहल और श्रद्धा के कारण सावन के अलावा वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला अनवरत जारी रहता है।
मंदिर परंपरा के अनुसार कोटेश्वर शब्द का शाब्दिक अर्थ एक करोड़ देवी-देवताओं के निवास स्थल से जोड़ा जाता है। मंदिर प्रांगण में शिव कुंड, पार्वती कुंड और सूर्य कुंड भी निर्मित हैं, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसी लोकमान्यता है कि इन कुंडों के सान्निध्य में सच्चे भाव से रुद्राभिषेक, जलार्पण और रुद्री पाठ करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं। संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए भी यह स्थान विशेष रूप से मंगलकारी माना गया है।
सावन के दौरान मंदिर में रोजाना विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य संचालन किया जा रहा है। श्रद्धालु कतारों में लगकर भगवान शिव को प्रिय बेलपत्र, गंगाजल, कच्चा दूध, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री समर्पित कर रहे हैं। तड़के मंगला आरती से लेकर देर शाम तक संपूर्ण परिसर हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गुंजायमान रहता है। श्रद्धालुओं की सहूलियत और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन तथा मंदिर प्रबंधन समिति ने कड़े और सुचारू इंतजाम किए हैं।
आध्यात्मिक महत्व के अलावा कोटेश्वर महादेव मंदिर अपने अद्भुत प्राकृतिक परिवेश के लिए भी जाना जाता है। भागीरथी नदी के पावन तट पर स्थित यह धाम प्राकृतिक सुंदरता और आत्मिक शांति का एक दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है। सावन के महीने में यहां आने वाले भक्त न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, बल्कि आसपास के मनोरम प्राकृतिक वातावरण से भी अभिभूत होते हैं। यही कारण है कि यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन के दृष्टिकोण से भी बेहद खास पहचान रखता है।
