September 5, 2026

नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

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मध्यप्रदेश। हाईकोर्ट ने नरसिंहपुर जिले के छह किसानों की निजी कृषि भूमि से सड़क निर्माण सामग्री हटाने को लेकर जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कलेक्टर को आदेश दिया कि किसानों के खेतों में रखी निर्माण सामग्री तीन दिन के भीतर हटाई जाए और जमीन को उसकी मूल स्थिति में बहाल कर किसानों को वापस सौंपा जाए।

यह मामला जामुन पानी और भोरपानी गांवों से जुड़ा है। किसानों ने वर्ष 2021 में अपनी निजी कृषि भूमि पर बिना अनुमति सड़क निर्माण से संबंधित गतिविधियां किए जाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय का रुख किया था। किसानों की शिकायत थी कि उनकी जमीन का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया जा रहा है और लंबे समय से उन्हें अपनी भूमि का सामान्य उपयोग करने में परेशानी हो रही है।

मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से यह दलील रखी गई थी कि संबंधित स्थान पर सड़क निर्माण का काम सीधे तौर पर नहीं किया जा रहा है। प्रशासन के अनुसार लोक निर्माण विभाग ने वहां केवल सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अस्थायी रूप से रखी थी। अदालत के समक्ष इस स्थिति को प्रशासन की ओर से अपने बचाव में प्रस्तुत किया गया।

हालांकि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रशासन की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला कलेक्टर पूरे जिले के समग्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं। किसी समस्या से संबंधित विभाग अलग होने मात्र से कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकते। न्यायालय ने जनहित से जुड़े मामलों में जिला प्रशासन की जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना।

अदालत की सख्ती के बाद कलेक्टर को किसानों की जमीन से निर्माण सामग्री हटाने के लिए स्पष्ट समय सीमा दी गई है। निर्देश के अनुसार तीन दिन के भीतर खेतों से सभी संबंधित सामग्री हटाकर भूमि को पहले जैसी स्थिति में लाना होगा। इसके बाद किसानों को उनकी जमीन वापस सौंपने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। उस दौरान कलेक्टर को अदालत के निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करनी होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण सामग्री हटाने और जमीन बहाल करने की कार्रवाई पूरी हुई या नहीं।

किसानों के लिए अदालत का यह आदेश लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण राहत के रूप में सामने आया है। वर्ष 2021 से भूमि के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद में अब प्रशासन को निश्चित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होगी।

इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी जिला प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी विभागीय कार्रवाई या प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देकर जिला स्तर पर नागरिकों की शिकायतों से जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती। कलेक्टर को जिले का समग्र प्रभारी मानते हुए न्यायालय ने समस्या के समाधान की जिम्मेदारी तय की है।

किसानों की निजी कृषि भूमि से जुड़ा यह विवाद सरकारी निर्माण गतिविधियों और नागरिकों के भूमि अधिकारों के बीच संतुलन का विषय भी सामने लाता है। अदालत के आदेश के बाद अब प्रशासन को न केवल निर्माण सामग्री हटानी होगी, बल्कि जमीन को वास्तविक रूप से उपयोग योग्य स्थिति में वापस करना भी सुनिश्चित करना होगा।

अगली सुनवाई में पेश होने वाली अनुपालन रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि आदेश के अनुरूप तीन दिन की समय सीमा में कार्रवाई पूरी की गई है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट के निर्देश से छह किसानों को अपनी जमीन वापस मिलने की उम्मीद बनी है और जिला प्रशासन के सामने तय समय में आदेश लागू करने की जिम्मेदारी है।

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