क्यों खास हैं नाग? कालसर्प दोष, अश्लेषा नक्षत्र और नागयज्ञ से जुड़ी है हजारों साल पुरानी परंपरा
ज्योतिष की बात करें तो सर्पों का संबंध राहु से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार नवग्रहों में राहु के अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प माने जाते हैं। इसी कारण राहु से जुड़े दोषों की शांति के लिए सर्प और नाग देवता की पूजा का विधान बताया जाता है। कुंडली में कालसर्प दोष होने की स्थिति में भी ज्योतिषीय परंपराओं में नाग पूजा और उससे जुड़े उपाय बताए जाते हैं। हालांकि कालसर्प दोष को लेकर ज्योतिषियों के बीच अलग अलग मत भी पाए जाते हैं।
नागों का संबंध केवल ग्रहों तक ही सीमित नहीं है। 27 नक्षत्रों में अश्लेषा नक्षत्र के देवता भी सर्प माने गए हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में अश्लेषा का संबंध नाग शक्ति से जोड़ा जाता है। इसी तरह प्राचीन ज्योतिष परंपराओं में नक्षत्रों के वाहनों और प्राकृतिक घटनाओं के बीच संबंध जोड़कर वर्षा के अनुमान लगाने की परंपरा भी बताई गई है। बारिश के मौसम में आकाशीय घटनाओं को समझने में इन प्रतीकों का उपयोग प्राचीन काल से होता रहा है।
भारतीय पौराणिक कथाओं में नागों की भूमिका और भी व्यापक है। रामायण में लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है जबकि महाभारत की परंपरा में बलराम का संबंध भी शेषनाग से जोड़ा जाता है। रामायण में मेघनाद की पत्नी सुलोचना को नागकन्या बताया गया है। वहीं सुरसा का उल्लेख नागों की माता के रूप में मिलता है। इन कथाओं में नाग केवल एक जीव के रूप में नहीं बल्कि शक्ति और रहस्य के प्रतीक के तौर पर भी दिखाई देते हैं।
महाभारत में भी नागों की कहानी बेहद महत्वपूर्ण है। अर्जुन का विवाह नागकन्या उलूपी से हुआ था। आगे चलकर राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डंसने से हुई। परीक्षित की मृत्यु से क्रोधित उनके पुत्र जन्मेजय ने नागों के विनाश के लिए नागयज्ञ शुरू कराया। कहा जाता है कि इस यज्ञ में बड़ी संख्या में नाग अग्नि में गिरने लगे थे। इसी दौरान ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने यज्ञ को रुकवाया और नागों की रक्षा की। इस कथा को नाग पंचमी की धार्मिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है।
नागों का उल्लेख कृष्ण की कथाओं में भी मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा भारतीय लोकजीवन में बेहद प्रसिद्ध है। वहीं महाभारत में भीम के नागलोक पहुंचने और वहां उन्हें असाधारण शक्ति प्राप्त होने का वर्णन मिलता है। मेघनाद द्वारा राम और लक्ष्मण को नागपाश में बांधने की कथा भी नागों के महत्व को दर्शाती है।
भारतीय परंपरा में नागों को केवल भय और विष का प्रतीक नहीं माना गया बल्कि उन्हें शक्ति संरक्षण उर्वरता और प्रकृति से जोड़कर भी देखा गया है। कश्मीर का अनंतनाग भी नाग परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नाम है। इतिहास और लोककथाओं में इस क्षेत्र का संबंध नागों से बताया गया है।
इस तरह कालसर्प दोष की ज्योतिषीय मान्यताओं से लेकर जन्मेजय के नागयज्ञ तक और कृष्ण की कालिया नाग कथा से लेकर शेषनाग की पौराणिक अवधारणा तक नाग भारतीय संस्कृति के अनेक स्तरों पर दिखाई देते हैं। यही वजह है कि नाग पंचमी केवल सांपों की पूजा का पर्व नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता में प्रकृति पौराणिक परंपरा और धार्मिक प्रतीकों के बीच गहरे संबंध को समझने का अवसर भी है।
