पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 98 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुका है, जिससे यह उम्मीद थी कि भारत में ईंधन सस्ता होगा। लेकिन इसके उलट हाल के हफ्तों में पेट्रोल और डीजल के दामों में कई बार बढ़ोतरी देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर कई रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस स्थिति की एक बड़ी वजह तेल कंपनियों की मूल्य नीति और उनका वित्तीय संतुलन है। भारत की प्रमुख तेल कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited पहले वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने के बावजूद कीमतें तुरंत नहीं बढ़ा पाईं थीं। उस समय कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुद घाटा सहा था। अब माना जा रहा है कि वे उसी पुराने नुकसान की भरपाई कर रही हैं।
इसके अलावा भारत की तेल आयात पर भारी निर्भरता भी कीमतों को प्रभावित करती है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार में मामूली उतार-चढ़ाव भी घरेलू कीमतों पर सीधा असर डालता है।
एक और अहम कारण है डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। भारत कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता क्यों न हो रहा हो।
कीमतों में टैक्स का भी बड़ा योगदान होता है। पेट्रोल और डीजल के दाम सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करते, बल्कि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी और वैट जैसे टैक्स भी शामिल होते हैं। यही टैक्स अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाली कीमत को काफी बढ़ा देते हैं।
इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन खर्च, डीलर कमीशन और लॉजिस्टिक्स लागत भी अंतिम कीमत में जुड़ते हैं। इन सभी कारकों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर तुरंत भारतीय बाजार में नहीं दिखता।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और नीचे नहीं आतीं, रुपया मजबूत नहीं होता और टैक्स संरचना में राहत नहीं मिलती, तब तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी कमी की उम्मीद करना मुश्किल है।
