उत्तराखंड में दलबदल का खेल, किसे मिलेगा फायदा और किसे होगा नुकसान
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कांग्रेस के सामने पहाड़ तो BJP के सामने तराई की चुनौती
Uttarakhand Election 2027: जल्द ही होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले अभी तक उत्तराखंड में कई बड़े चेहरे पाला बदल चुके हैं। इसके चलते करीब 20 सीटों पर समीकरण बदल गए हैं। वहीं लोगों का यह भी मानना है कि राजकुमार ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री से तराई में भी मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले प्रदेश की सियासत में दलबदल ने चुनावी समीकरणों को काफी बदल दिया है। जानकारों की मानें तो इसमें अभी और व्यापकता देखने को मिल सकती है। एक ओर जहां कांग्रेस के कई पुराने और चुनाव लड़ चुके चेहरे भाजपा में जा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के पूर्व विधायकों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं ने भी कांग्रेस की ओर रुख किया है। ज्ञात हो कि रुद्रपुर विधानसभा से दो बार विधायक रहे राजकुमार ठुकराल सहित 6 भाजपा नेताओं को इसी साल 28 मार्च को कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता दिलाई गई।
ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहने वाला, बल्कि पहाड़ बनाम तराई और पुराने संगठन बनाम नए चेहरों का समीकरण भी चुनावी नतीजों पर असर डालेगा। दोनों ही पार्टियां अभी से संगठन और संभावित उम्मीदवारों को लेकर अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी हैं। यहां ये बात भी सच है कांग्रेस के लिए भी ये स्थिति दिक्कत वाली तो होगी। लेकिन, भाजपा के सामने पुरानी सीटों को बचाने का खतरा सबसे अधिक होगा।
ऐसे में राजनीति के जानकारों का कहना है कि यह स्थिति हर तरह से कांग्रेस को ही लाभ दिला सकती है, क्योंकि भाजपा इस समय लगभग अपने पीक पर है और वहीं कांग्रेस के पास ज्यादा कुछ खोने को है नहीं। क्योंकि भाजपा के पास वर्तमान में उत्तराखंड की करी 67 फीसदी सीटें है जबकि कांग्रेस के बाद अभी 30 फीसदी से भी कम सीटें हैं। ऐसे में सरकार के प्रति असंतुष्टी सहित नेताओं के द्वार दिए गए विवादास्पद बयान भी भाजपा के लिए साल 2027 के चुनावों में परेशानी का कारण बनते दिख रहे हैं। जबकि कांग्रेस जो अत्यंत कमजोर अवस्था है उसके द्वारा प्रसारित कई चीजों को लेकर जनता उनके साथ आती दिख रही है। साथ ही दलबदल की स्थिति में जनता के समक्ष भाजपा का कमजोर पक्ष सामने आता दिख रहा है। वहीं कुछ नेताओं का बडबोलापन भी पार्टी को वर्तमान सीटों पर नुकसान दे सकता है।
यहां ये भी समझ लें कि कांग्रेस के लिए उत्तरकाशी जिले का समीकरण खास तौर पर बदल गया है। 2022 में कांग्रेस के टिकट पर पुरोला से मालचंद, यमुनोत्री से दीपक बिजल्वाण और गंगोत्री से विजयपाल सिंह सजवाण चुनाव मैदान में थे। अब ये तीनों नेता भाजपा के साथ हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस इन तीनों सीटों पर चुनाव से बाहर हो गई है, लेकिन पार्टी को स्थानीय स्तर पर नए चेहरे तलाशने और दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे बढ़ाने की चुनौती जरूर है। वहीं दूसरी ओर जनता की नाराजगी के मामले में देखें तो कालाढूंगी में वर्तमान भाजपा के विधायक बंसीधर भगत के कार्यों से असंतुष्ट जनता व उनके ”लक्ष्मी सरस्वती को पटाओं” वाले वायरल हो चुके बयान के अलावा मुझे नहीं तो मेरे बेटे को टिकट दो वाले बयान ने जनता में घोर नाराजगी पैदा कर दी है, जमीनी सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे में इस सीट पर भाजपा द्वारा पुन: इन्हें ही उतारना पार्टी को भारी पड़ सकता है। जो बीजेपी के लिए घाटे का सौदा हो सकता है।
वहीं यदि पहाड़ी विधानसभा सीटों की बात करें तो यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, गांव-गांव का संपर्क और स्थानीय संगठन चुनाव में काफी मायने रखता है। ऐसे में कांग्रेस के लिए सिर्फ नया प्रत्याशी घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा, उसे उसके पीछे पूरा संगठन भी खड़ा करना पड़ेगा।
कांग्रेस को करीब 20 सीटों पर नए समीकरण बनाने होंगे
दलबदल के बाद गढ़वाल से लेकर कुमाऊं और मैदानी क्षेत्रों तक कई सीटों पर कांग्रेस की पुरानी चुनावी तस्वीर बदल गई है। टिहरी में धन सिंह नेगी, धनौल्टी में जोत सिंह बिष्ट, पौड़ी में नवल किशोर, लैंसडाउन में अनुकृति गुसाईं रावत, चौबट्टाखाल में केसर सिंह नेगी, यमकेश्वर में शैलेंद्र रावत और बद्रीनाथ में राजेंद्र भंडारी जैसे नाम अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं। इनकी भरपाई के लिए कांग्रेस को नए समीकरण बनाने होंगे।
मैदानी और कुमाऊं क्षेत्र में खानपुर, रुड़की, कालाढूंगी, रुद्रपुर, भीमताल, बागेश्वर और धर्मपुर जैसी सीटों पर भी पुराने समीकरण बदले हैं। डोईवाला में वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट के निधन के बाद पार्टी के सामने अलग तरह की नेतृत्व चुनौती खड़ी हुई है।
जानकारों के अनुसार इसके बावजूद इन सभी सीटों को कांग्रेस की कमजोर सीट मान लेना जल्दबाजी होगी। कारण यह है कि विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बदलने के साथ समीकरण भी बदलते हैं। कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा काम यही है कि वह इन सीटों पर ऐसे स्थानीय चेहरे तलाशे जिनकी स्वीकार्यता सिर्फ पार्टी संगठन तक सीमित न हो, बल्कि जनता के बीच भी हो।
बद्रीनाथ ने दी ये सीख
इस पूरे दलबदल के असर को समझने का महत्वपूर्ण एक उदाहरण बद्रीनाथ है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए राजेंद्र भंडारी को भाजपा ने 2024 के उपचुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया, लेकिन कांग्रेस के लखपत बुटोला ने उन्हें हरा दिया। इससे एक राजनीतिक संकेत साफ मिला कि किसी बड़े नेता का पार्टी बदलना अपने साथ पूरा वोट बैंक ले जाने की गारंटी नहीं है।
जानकारों का मानना है कि यही बात 2027 में भी दोनों दलों पर लागू होगी। कांग्रेस से भाजपा में गए नेताओं के सामने एक ओर जहां यह साबित करने की चुनौती होगी कि उनका व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी बदलने के बाद भी कायम है, जबकि वहीं दूसरी तरफ भाजपा से कांग्रेस में आए नेताओं को भी यही परीक्षा देनी होगी। यानी दलबदल के बाद असली ताकत का फैसला चुनाव मैदान में वोट से होगा, सिर्फ सदस्यता ग्रहण करने के मंच पर नहीं।
कांग्रेस ने भी भाजपा के कई पुराने चेहरों को जोड़ा
बताते चलें कि कांग्रेस ने भी 2027 से पहले भाजपा के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़कर पलटवार किया है। मार्च 2026 में भाजपा के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल और भीमलाल आर्य समेत छह नेता कांग्रेस में शामिल हुए। ठुकराल रुद्रपुर से दो बार विधायक रह चुके हैं, जबकि नारायण पाल और भीमलाल आर्य का भी अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक आधार रहा है।
इन नेताओं के कांग्रेस में आने से खास तौर पर तराई और मैदानी सीटों पर समीकरण बदलते हुए दिख रहे हैं। जनता के बीच रुद्रपुर में राजकुमार ठुकराल की एंट्री को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। वह भाजपा के पुराने चेहरे रहे हैं और अब कांग्रेस के साथ हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस पहाड़ में नए चेहरों की तलाश के साथ-साथ तराई में अनुभवी राजनीतिक चेहरों के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
क्यों महत्वपूर्ण? तराई बनाम पहाड़ का एंगल
2027 के चुनाव में तराई बनाम पहाड़ का राजनीतिक एंगल भी खास हो सकता है। इसका कारण यह है कि जहां एक तरफ उत्तराखंड की पहाड़ी सीटों पर पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और आपदा जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ तराई और मैदानी क्षेत्रों में उद्योग, कृषि, जमीन, रोजगार, शहरी विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों का असर अधिक दिखाई देता है।
ऐसे में जानकारों की मानें तो दोनों पार्टियों के लिए एक जैसी रणनीति पूरे प्रदेश में काम नहीं करेगी। कांग्रेस के सामने पहाड़ में पुराने चेहरों के जाने के बाद नई लीडरशिप तैयार करने की चुनौती है, वहीं तराई में राजकुमार ठुकराल जैसे पुराने व मजबूत नेताओं की मौजूदगी से वह भाजपा के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए स्थिति उलटी चुनौती वाली है— इसे तहत उन्हें पहाड़ में कांग्रेस से आए नेताओं को समायोजित करना और तराई में अपने पुराने नेताओं व कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नियंत्रित रखना।
टिकट बंटवारा: भाजपा के लिए बनेगा अग्निपरीक्षा
अधिकांश राजनैतिक जानकारों को मानना है कि कांग्रेस के नेताओं का भाजपा में जाना अभी फिलहाल कांग्रेस के लिए नुकसान जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन भाजपा के सामने भी इसका एक अन्य पहलू है। जिन सीटों पर कांग्रेस से आए नेता भाजपा में पहुंचे हैं, वहां पहले से भाजपा के पुराने दावेदार मौजूद हैं। ऐसे में जहां वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता यदि टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं और बाहर से आए नेता को टिदे दिया जाता है, तो असंतोष की स्थिति बन सकती है।
यही वजह है कि 2027 में दलबदल का सबसे बड़ा असर शायद टिकट बंटवारे के समय दिखाई देगा। दोनों दलों को तय करना होगा कि चुनाव जिताने की क्षमता के आधार पर नए चेहरे को प्राथमिकता दी जाए या पुराने कार्यकर्ता को। इस संतुलन में जरा सी चूक चुनाव से पहले ही बगावत की स्थिति पैदा कर सकता है।
चुनौती: कांग्रेस के सामने संगठन खड़ा करने की
राजनीति के जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए सिर्फ बड़े नेताओं की वापसी या नए नेताओं का शामिल होना काफी नहीं होगा। इन नेताओं को पार्टी को बूथ स्तर के संगठन से जोड़ना होगा। विशेष रूप से जिन पहाड़ी सीटों पर पुराने चुनावी चेहरे चले गए हैं, वहां समय रहते दूसरी पंक्ति तैयार करनी होगी।
अंदरखाने से आ रही खबरों के अनुसार कांग्रेस अपनी चुनावी तैयारी के तहत पार्टी संगठन में भी बदलाव कर रही है। वहीं भाजपा ने भी 2027 को लेकर बूथ स्तर पर अपनी तैयारी तेज की है और पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन में अनुशासन व एकजुटता पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में दोनों दलों की तैयारी बताती है कि चुनाव शुरु होने से पहले ही जमीन पर मुकाबला शुरू हो चुका है।
2027 की लड़ाई में किसका दांव भारी?
राजनीति के विशेषज्ञों के अनुसार पूरे घटनाक्रम को देखें तो फिलहाल दलबदल का असर कांग्रेस पर ज्यादा दिखाई देता है, क्योंकि उसके कई 2022 के चुनावी चेहरे अब भाजपा के साथ हैं। परंतु यह तस्वीर इतनी भी सीधी नहीं है। कांग्रेस ने भी भाजपा के पूर्व विधायकों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को अपने पाले में लाकर जवाब दिया है। वहीं बद्रीनाथ जैसे उदाहरण बताते हैं कि किसी नेता के पार्टी बदलने से पूरा वोट बैंक अपने आप नहीं बदलता।
इसलिए 2027 में असली लड़ाई चेहरों से ज्यादा संगठन और वोट ट्रांसफर की होगी। पहाड़ में कांग्रेस कितनी जल्दी नए चेहरे तैयार करती है, तराई में राजकुमार ठुकराल जैसे नेताओं का कितना प्रभाव दिखाई देता है, भाजपा अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितना संतुष्ट रखती है और दोनों पार्टियां नए-पुराने नेताओं के बीच कितना संतुलन बना पाती हैं। चुनावों में जीत इन्हें आधारों पर तय होगी।
जानकारों के अनुसार कुल मिलाकर इन सवालों के जवाब ही चुनावी नतीजों की दिशा तय करेंगे। उनका यह भी मानना है कि एक बात जरूर साफ है, 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता बनाम विपक्ष का मुकाबला नहीं होगा। इस बार पहाड़ की बदली हुई राजनीतिक जमीन और तराई के नए समीकरण, दोनों मिलकर उत्तराखंड की चुनावी कहानी लिखेंगे।
