तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा… किसी भी दल के पास बहुमत नहीं, अब क्या करेंगे गवर्नर?
चेन्नई। तमिलनाडु (Tamil Nadu) की जनता ने इस विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में ऐसा फैसला सुनाया है कि वहां की राजनीति फंस सी गई है। किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। अभिनेता से राजनेता बने विजय (Vijay) की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (Tamilaga Vetri Kazhagam- TVK) ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में 108 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर इतिहास तो रच दिया है, लेकिन सत्ता से अभी भी दूर ही नजर आ रही है। उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 117 विधायकों का समर्थन प्राप्त नहीं है। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर (Governor Rajendra Arlekar) ने विधानसभा तो भंग कर दी है, लेकिन विजय को सरकार बनाने का न्यौता देने से पहले बहुमत का ठोस सबूत पेश करने को कहा है।
आपको यह भी बता दें कि विजय ने दो सीटों से चुनाव जीता है। नियमों के मुताबिक उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। इसके साथ पार्टी के विधायकों की संख्या 107 ही रह जाएगी। उन्हें बहुमत के लिए 10 और विधायकों के समर्थन की जरूरत है। इस चुनाव में सत्तारूढ़ डीएमके गठबंधन को 59, एआईएडीएमके गठबंधन को 47, कांग्रेस को 5 और पीएमके को 4 सीटें मिली हैं। अन्य छोटे दलों के पास 2 सीटें हैं। कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देने का एलान किया है, जिससे आंकड़ा 112 तक पहुंचता है। हालांकि, अभी भी 5 और सीटों की दरकार है। चर्चा यह भी है कि भाजपा के समर्थन से टीवीके और एआईएडीएमके के बीच भी बातचीत चल रही है।
त्रिशंकु विधानसभा के हालात में क्या करेंगे राज्यपाल?
नियमों के मुताबिक, जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राज्यपाल के पास शक्तियां होती हैं। न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया के अनुसार, राज्यपाल का मुख्य कार्य सरकार का गठन करवाना है न कि अपनी पसंद की विचारधारा वाली सरकार चुनना। राज्यपाल को सबसे पहले चुनाव पूर्व गठबंधन, उसके बाद सबसे बड़ी पार्टी और सबसे अंत में चुनाव बाद का गठबंधन को मौका देना होता है। यह उस स्थिति में होता है जब उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्याबल हो। मुख्यमंत्री को पद संभालने के 30 दिनों के भीतर सदन में विश्वास मत हासिल करना होगा। बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए।
राज्यपालों के विवादित फैसले
हालांकि, राज्यपालों ने अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग रुख अपनाए हैं, जिससे अक्सर विवाद पैदा हुए हैं। 2017 में गोवा और मिजोरम में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन वहां के राज्यपालों ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाया क्योंकि भाजपा ने अन्य दलों के समर्थन के पत्र पहले पेश कर दिए थे। इसके एक साल बाद कर्नाटक में भी ऐसी ही स्थिति थी। यहां भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। राज्यपाल ने बी.एस. येदियुरप्पा को शपथ दिला दी, लेकिन कांग्रेस और जेडीएस के चुनाव बाद गठबंधन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 24 घंटे के भीतर बहुमत साबित करने की चुनौती मिलने पर येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा।
