ई रिक्शा चलाने वाले बिहार के लाल ने रचा इतिहास कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने दिलाया भारत को पहला मेडल
झंडू कुमार की सफलता इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि उनका जीवन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता है। कभी ई रिक्शा चलाकर परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाले झंडू के पिता सड़क किनारे सब्जियां बेचकर घर चलाते थे। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया। लगातार अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का तिरंगा ऊंचा कर दिखाया।
29 वर्षीय झंडू कुमार ने प्रतियोगिता की शुरुआत पूरे आत्मविश्वास के साथ की। दूसरे प्रयास में उन्होंने 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और खुद को पदक की दौड़ में मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। यह वजन उनके व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से थोड़ा कम जरूर था लेकिन प्रतियोगिता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने अंतिम प्रयास में 196 किलोग्राम वजन उठाकर बड़ा रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की लेकिन मामूली अंतर से सफल नहीं हो सके। हालांकि उनका पहले का प्रदर्शन उन्हें पदक दिलाने के लिए पर्याप्त साबित हुआ।
मुकाबले में आखिरी क्षण तक रोमांच बना रहा। नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने अंतिम प्रयास में 212 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की लेकिन वह इसमें असफल रहे। इसी के साथ झंडू कुमार का ब्रॉन्ज मेडल पूरी तरह पक्का हो गया। इस रोमांचक नतीजे के बाद भारतीय दल और दर्शकों में खुशी की लहर दौड़ गई।
प्रतियोगिता में नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने 208 किलोग्राम की सफल लिफ्ट के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया जबकि इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने 199 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक हासिल किया। झंडू कुमार ने 190 किलोग्राम की सफल लिफ्ट और 130.9 अंक के साथ तीसरा स्थान प्राप्त करते हुए भारत की झोली में पहला पदक डाल दिया।
इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दिन की शुरुआत भारत के लिए निराशाजनक रही थी। पुरुषों की लाइटवेट स्पर्धा में भारतीय खिलाड़ी पदक से चूक गया था लेकिन झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन कर पूरे भारतीय दल का मनोबल बढ़ा दिया। उनकी जीत ने यह संदेश दिया कि भारतीय खिलाड़ी हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं।
झंडू कुमार की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया कि सफलता पाने के लिए महंगे संसाधनों से ज्यादा जरूरी मजबूत इरादे और लगातार मेहनत होती है। बिहार के एक साधारण परिवार से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर देश के लिए पदक जीतना उनके संघर्ष और समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है। अब पूरे देश को उम्मीद है कि इस पहले पदक के बाद भारतीय खिलाड़ी आने वाले मुकाबलों में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए पदकों की संख्या लगातार बढ़ाएंगे।
