March 8, 2026

जबलपुर हाईकोर्ट ने पुलिस-पूर्व महापौर विवाद पर सख्त रुख अपनाया, कहा: जब पुलिस सुरक्षित नहीं तो जनता कैसे रहेगी सुरक्षित

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जबलपुर।
जबलपुर में पूर्व महापौर प्रभात साहू और पुलिसकर्मी के बीच सितंबर 2025 में हुए विवाद के मामले ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की गंभीर चिंता को जन्म दिया है। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें पूर्व महापौर द्वारा पुलिसकर्मी के साथ अभद्र व्यवहार और हाथापाई की कोशिश साफ दिखाई दे रही थी।
घटना के संबंध में दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि यदि थानों में पुलिसकर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो वे आम जनता को सुरक्षा कैसे प्रदान करेंगे। इस मामले को कोर्ट ने पुलिस विभाग का मनोबल गिराने वाला बताया।

सख्त आदेश और नोटिस जारी
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व महापौर प्रभात साहू, पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय और लार्डगंज थाना प्रभारी को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने सभी को 20 जनवरी 2026 को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और संबंधित एफआईआर की केस डायरी पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सभी पक्षों को जवाब देने का अवसर मिलेगा, ताकि न्यायपूर्ण निष्कर्ष निकाला जा सके।

पुलिस कार्रवाई पर सवाल
कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि स्पष्ट वीडियो साक्ष्य और आरोपी की पहचान होने के बावजूद पुलिस ने ‘अज्ञात’ के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की। साथ ही यह भी पूछा गया कि संबंधित नेताओं के नाम मामले में क्यों नहीं जोड़े गए। याचिका में आरोप लगाया गया कि दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय ईमानदारी से ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया और उसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कर दी गई।

पूर्व महापौर और पुलिसकर्मी का विवाद
याचिका के अनुसार, 18 सितंबर 2025 को बल्देवबाग चौक पर हेलमेट चेकिंग के दौरान विवाद हुआ। वायरल वीडियो में पूर्व महापौर पुलिसकर्मियों से अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते और हाथापाई करने का प्रयास करते दिख रहे हैं। यह घटना न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि कानून और व्यवस्था की स्थिति पर भी गंभीर चेतावनी देती है।

जनहित और कानून की दृष्टि से महत्व
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि प्रशासनिक और सार्वजनिक सुरक्षा के नजरिए से भी अहम है। कोर्ट का सख्त रुख यह संकेत देता है कि पुलिस और नेताओं के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि पुलिस स्वयं सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल होगा।

हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद अब सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, एफआईआर, केस डायरी और अन्य सबूतों का अध्ययन कर न्यायसंगत कार्रवाई की जाएगी। इससे पुलिस और नागरिक दोनों के बीच भरोसा कायम करने में मदद मिलेगी।

जबलपुर हाईकोर्ट का यह कदम न केवल पूर्व महापौर और पुलिसकर्मी के विवाद को सुलझाने में मदद करेगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी के भी ऊपर वरीयता नहीं होगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा और जवाबदेही सभी के लिए समान रूप से लागू होगी।
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