July 17, 2026

जहां हर मिनट फूटता था 25 हजार लीटर पानी, वहीं बनी देश की सबसे लंबी जल सुरंग, सीएम मोहन यादव ने किया ड्रीम प्रोजेक्ट का निरीक्षण

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मध्य प्रदेश के कटनी जिले में लगभग तैयार हो चुकी स्लीमनाबाद जल सुरंग राज्य की सबसे महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजनाओं में शामिल हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को इस परियोजना का निरीक्षण करते हुए इसे प्रदेश के किसानों और विंध्य-महाकौशल क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। करीब 17 वर्षों के लंबे निर्माण कार्य के बाद अंतिम चरण में पहुंची यह परियोजना नर्मदा के पानी को गुरुत्वाकर्षण के आधार पर सोन नदी क्षेत्र तक पहुंचाएगी, जिससे हजारों किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।

करीब 11.95 किलोमीटर लंबी यह जल सुरंग देश की सबसे लंबी जल सुरंगों में गिनी जा रही है। इसके माध्यम से जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना सहित छह जिलों के लगभग 1450 गांवों की करीब 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा। सरकार का मानना है कि इस परियोजना के शुरू होने से विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में सुधार होगा और जल संकट से प्रभावित इलाकों को स्थायी राहत मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि परियोजना का निर्माण आसान नहीं था। शुरुआती वर्षों में कार्य अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन बाद में आधुनिक तकनीक और विदेशी मशीनों की मदद से खुदाई का काम तेज किया गया। कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों, कठोर चट्टानों, भूमिगत गुफाओं और लगातार हो रहे जल रिसाव के बीच इंजीनियरों तथा तकनीकी विशेषज्ञों ने सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए कार्य को आगे बढ़ाया। कई स्थानों पर सुरंग जमीन की सतह से लगभग 120 फीट नीचे बनाई गई है।

निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रति मिनट लगभग 25 हजार लीटर तक भूमिगत पानी का तेज प्रवाह था। इसके कारण सुरंग के भीतर लगातार जलभराव और मिट्टी धंसने जैसी परिस्थितियां पैदा होती रहीं। प्रारंभिक मशीनों को भी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद अत्याधुनिक जर्मन तकनीक और विशेष ग्राउटिंग पद्धति का उपयोग किया गया। इन तकनीकी उपायों की मदद से निर्माण कार्य को सुरक्षित ढंग से पूरा किया गया। सुरंग राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे ट्रैक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से गुजरती है, लेकिन निर्माण के दौरान किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं मिली।

परियोजना की अनुमानित लागत समय के साथ बढ़ती गई। वर्ष 2008 में शुरू हुई इस योजना की शुरुआती लागत लगभग 799 करोड़ रुपये थी, जो तकनीकी चुनौतियों और अतिरिक्त निर्माण कार्यों के कारण बढ़कर 1600 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। अधिकारियों के अनुसार परियोजना का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है और इससे जुड़ी नहरों का निर्माण भी लगभग समाप्ति पर है। आने वाले महीनों में चरणबद्ध तरीके से सिंचाई नेटवर्क को पूरी तरह क्रियाशील किया जाएगा।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि क्षेत्र में पेयजल उपलब्धता, कृषि उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देगी। उन्होंने विश्वास जताया कि परियोजना के पूर्ण रूप से शुरू होने के बाद विंध्य और महाकौशल क्षेत्र की कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य आगामी चरणों में सिंचाई क्षमता का लगातार विस्तार करते हुए अधिक से अधिक किसानों तक इसका लाभ पहुंचाना है, जिससे प्रदेश का कृषि विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों मजबूत हो सकें।

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