June 12, 2026

राज्यसभा चुनाव विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश, मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज, संवैधानिक सीमाओं का दिया हवाला

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मध्य प्रदेश : से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार रहीं मीनाक्षी नटराजन को उस समय बड़ा कानूनी झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता और संविधान में इसके लिए स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की गई हैं।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 329 का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं में न्यायिक हस्तक्षेप पर प्रतिबंध है। अदालत ने माना कि इस चरण में रिट याचिका पर विचार करना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगा। इसी आधार पर याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन निर्वाचन अधिकारी द्वारा निरस्त किया जाता है तो उसके लिए उपलब्ध वैधानिक उपाय चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखना होता है। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा कि क्या ऐसे मामलों में पहले किसी अदालत ने चुनावी प्रक्रिया के बीच हस्तक्षेप किया है, हालांकि याचिकाकर्ता पक्ष कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सका।

मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का नामांकन अनुचित आधार पर खारिज किया गया। उनका कहना था कि जिस आपराधिक मामले का उल्लेख न करने का आरोप लगाया गया है, वह ऐसा मामला नहीं था जिसके प्रकटीकरण की कानूनी बाध्यता बनती हो। उन्होंने तर्क दिया कि संबंधित मामले में केवल समन जारी हुए थे और उसे नामांकन निरस्त करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए था।

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब राज्यसभा चुनाव के लिए दाखिल किए गए नामांकन पत्रों की जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने शपथपत्र में एक लंबित न्यायालयीन शिकायत का उल्लेख नहीं किया। निर्वाचन अधिकारी द्वारा उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रस्तुत शपथपत्र अधूरा है, जिसके चलते उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया।

चुनावी प्रक्रिया के दौरान इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। आपत्ति दर्ज कराने वाले पक्ष का दावा था कि उम्मीदवार ने अपने खिलाफ दर्ज एक मामले की जानकारी छिपाई है, जबकि कांग्रेस ने इसे तकनीकी आधार पर लिया गया निर्णय बताते हुए निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इसे केवल व्यक्तिगत हार के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उनकी शिकायतों पर अपेक्षित तत्परता से कार्रवाई नहीं की और पूरे मामले में निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।

कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि शुरू से ही उन्हें चुनावी प्रक्रिया के संचालन को लेकर संदेह था और अदालत के फैसले के बावजूद उनकी चिंताएं समाप्त नहीं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि उनका संघर्ष किसी राज्य सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए था।

इस फैसले के साथ फिलहाल राज्यसभा चुनाव से जुड़े इस विवाद का न्यायिक अध्याय समाप्त हो गया है। हालांकि राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रह सकता है, क्योंकि विपक्ष चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है।

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