July 28, 2026

संघर्ष से निकला छात्र बना आंदोलन का चेहरा बड़वानी के अरुण बड़ोले ने 26 दिन तक उठाई हजारों विद्यार्थियों की आवाज

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बड़वानी  मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के छोटे से गांव लिंबई के रहने वाले अरुण बड़ोले की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। मां आज भी खेतों में मजदूरी करके परिवार का पेट पालती हैं जबकि पिता की आंखों की रोशनी पिछले दो वर्षों से लगातार कमजोर होती जा रही है। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई का सफर आसान नहीं था लेकिन अरुण ने सिर्फ अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा बल्कि हजारों विद्यार्थियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे अरुण पिछले छह वर्षों से इंदौर में किराए के कमरे में रह रहे हैं। पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए वे ड्राइवरी का काम भी करते हैं। परिवार में तीन बहनों की जिम्मेदारी और सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने संघर्ष को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। जब देशभर में नीट परीक्षा को लेकर विवाद और छात्रों का आंदोलन तेज हुआ तब अरुण ने भी इंदौर में छात्रों की आवाज बुलंद करने का निर्णय लिया।

उन्होंने 30 जून से आंदोलन की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में उनके साथ केवल चार साथी थे। पहले दस से बारह दिनों तक धरना स्थल पर गिने चुने छात्र ही मौजूद रहते थे। कई बार ऐसा भी लगा कि आंदोलन आगे नहीं बढ़ पाएगा लेकिन अरुण और उनके साथियों ने हार नहीं मानी। लगातार डटे रहने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का असर यह हुआ कि धीरे धीरे छात्रों सामाजिक संगठनों और शहर के लोगों का समर्थन मिलने लगा। देखते ही देखते यह आंदोलन प्रदेश के सबसे लंबे छात्र आंदोलनों में शामिल हो गया और पूरे 26 दिनों तक लगातार चलता रहा।

अरुण का कहना है कि अगर वे अपने जैसे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य के लिए आवाज नहीं उठाते तो खुद को कभी माफ नहीं कर पाते। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता हर छात्र का अधिकार है। यही सोच उन्हें लगातार संघर्ष करने की ताकत देती रही। आर्थिक परेशानियां और रोजमर्रा की जिम्मेदारियां भी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकीं।

आंदोलन के दौरान उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बारिश हो या कम होती भीड़ उन्होंने धरना स्थल नहीं छोड़ा। धीरे धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल होने लगे। इस दौरान शहर के कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने भी उनका समर्थन किया जिससे आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।

आंदोलन समाप्त होने के बाद भी अरुण का कहना है कि उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। उनका मानना है कि यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में पारदर्शिता और विद्यार्थियों के अधिकारों का सवाल है। यदि भविष्य में भी छात्रों के साथ किसी प्रकार का अन्याय होता है तो वे फिर से आंदोलन के लिए तैयार रहेंगे। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए वे हमेशा आवाज उठाते रहेंगे।

अरुण बड़ोले की कहानी बताती है कि सीमित संसाधन कभी बड़े सपनों और मजबूत इरादों के सामने बाधा नहीं बनते। कठिन परिस्थितियों में भी यदि उद्देश्य स्पष्ट हो और हौसला मजबूत हो तो एक साधारण छात्र भी हजारों लोगों की उम्मीद और संघर्ष का प्रतीक बन सकता है।

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