मस्जिद में नौकरी का सपना टूटा, 40 कमरों के टॉयलेट साफ कराए, भारतीय दूतावास ने कराई वतन वापसी
फैजान ने बताया कि जनवरी 2026 में उनकी मुलाकात एक एजेंट से हुई थी। एजेंट ने भरोसा दिलाया कि ओमान की एक मस्जिद में उन्हें इमाम के रूप में नियुक्त किया जाएगा। शुरुआत में 20 हजार रुपए लिए गए और बाद में मेडिकल व अन्य औपचारिकताओं के नाम पर कुल मिलाकर करीब दो लाख रुपए वसूल लिए गए। परिवार ने बड़ी मुश्किल से यह रकम जुटाई और 4 मई 2026 को फैजान ओमान के मस्कट पहुंच गए।
मस्कट पहुंचने के बाद उन्हें दो-तीन दिन कंपनी के पास रखा गया, लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गई। जिस धार्मिक सेवा के लिए उन्हें भेजा गया था, उसकी जगह उन्हें एक मंत्रालय के कार्यालय में सफाई कर्मचारी बना दिया गया। रोजाना दर्जनों कमरों, टॉयलेट, बाथरूम और बर्तनों की सफाई कराई जाती थी। लंबे समय तक लगातार 14 से 15 घंटे काम लेने के बावजूद न तो उन्हें वेतन दिया गया और न ही भोजन की पर्याप्त व्यवस्था की गई।
फैजान के मुताबिक जब भी उन्होंने वेतन या खाने के लिए पैसे मांगे तो कंपनी हर बार टालती रही। धीरे-धीरे उनके पास मौजूद सारी रकम खत्म हो गई। कई बार लगातार चार-चार दिन तक उन्हें बिना भोजन के रहना पड़ा। ऐसे कठिन समय में कंपनी ने कोई मदद नहीं की, बल्कि वहां रहने वाले कुछ भारतीय नागरिक उनके सहारा बने। मस्कट में रहने वाले नवाब भाई ने उन्हें खाने के लिए पैसे दिए, जबकि मोहम्मद खलील अहमद ने लगभग डेढ़ महीने तक अपने घर में रखकर भोजन और रहने की व्यवस्था की।
मदद की उम्मीद में फैजान लगातार उस एजेंट से संपर्क करते रहे जिसने उन्हें विदेश भेजा था। शुरुआत में एजेंट हर बार एक-दो दिन इंतजार करने की बात कहकर उन्हें टालता रहा, लेकिन बाद में उसने उनका नंबर ही ब्लॉक कर दिया। जब फैजान ने कंपनी से भारत लौटने की इच्छा जताई तो उनसे 650 ओमानी रियाल जमा कराने की शर्त रख दी गई। इसी दौरान कंपनी ने उनका पासपोर्ट भी अपने कब्जे में ले लिया, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई।
18 जुलाई को यह मामला भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन तक पहुंचा। उन्होंने तुरंत भारतीय दूतावास, विदेश मंत्रालय और भारतीय प्रवासी सहायता केंद्र को शिकायत भेजी। शिकायत मिलने के बाद भारतीय दूतावास ने दस्तावेजों की प्रक्रिया शुरू कराई और लेबर कोर्ट से एग्जिट परमिट दिलवाया। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 26 जुलाई को उनकी वापसी की मंजूरी मिली। 28 जुलाई की रात फैजान मुंबई पहुंचे और 30 जुलाई को अपने गृह गांव दीवानगंज लौट आए।
सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन ने बताया कि उन्होंने अब तक विदेशों में फंसे 1500 से अधिक भारतीयों की सुरक्षित वापसी में मदद की है। उनका कहना है कि यदि पीड़ित समय रहते सही दस्तावेजों के साथ शिकायत दर्ज कराएं तो भारतीय दूतावास अधिकांश मामलों में प्रभावी कार्रवाई करता है। फैजान की आपबीती विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी से सावधान रहने और केवल अधिकृत माध्यमों से ही विदेश जाने की अहम सीख भी देती है।
