लोक सेवा गारंटी से बाहर हुई मिट्टी और बीज जांच, देरी होने पर किसान नहीं कर सकेंगे अपील
लोक सेवा प्रबंधन विभाग ने 29 जुलाई को अधिसूचना जारी कर वर्ष 2017 में अधिसूचित दोनों सेवाओं को डी नोटिफाई कर दिया। इसके साथ ही मिट्टी नमूना परीक्षण और प्रमाणित बीज नमूना परीक्षण अब लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2010 के तहत मिलने वाली सेवाओं की सूची से बाहर हो गए हैं। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ेगा जो खेती से पहले मिट्टी की गुणवत्ता और बीज की प्रमाणिकता की जांच के लिए सरकारी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहते हैं।
वर्ष 2017 में राज्य सरकार ने किसानों को समयबद्ध और पारदर्शी सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इन दोनों सेवाओं को लोक सेवा गारंटी अधिनियम में शामिल किया था। इसके तहत मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट 30 कार्य दिवस के भीतर उपलब्ध कराने का प्रावधान था। इसके लिए सहायक मिट्टी परीक्षण अधिकारी सहायक मृदा सर्वेक्षण अधिकारी और संबंधित प्रयोगशाला प्रभारी को जिम्मेदार बनाया गया था। वहीं प्रमाणित बीज नमूना परीक्षण की रिपोर्ट 60 कार्य दिवस के भीतर देने की व्यवस्था थी जिसकी जिम्मेदारी संभागीय राज्य बीज परीक्षण प्रयोगशाला के बीज परीक्षण अधिकारी पर निर्धारित की गई थी।
यदि निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई जाती थी तो किसानों को कानूनी रूप से अपील करने का अधिकार प्राप्त था। मिट्टी परीक्षण के मामलों में किसान पहले जिले के उप संचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास के समक्ष प्रथम अपील कर सकते थे। यदि वहां भी समाधान नहीं मिलता था तो संभागीय संयुक्त संचालक के पास द्वितीय अपील का विकल्प मौजूद था। इसी तरह बीज परीक्षण के मामलों में भी दो स्तर की अपील व्यवस्था लागू थी जिससे किसानों को समय पर सेवा सुनिश्चित कराने का अधिकार मिलता था।
नई अधिसूचना लागू होने के बाद अब यह पूरी व्यवस्था समाप्त हो गई है। यानी अब मिट्टी और बीज परीक्षण की रिपोर्ट देने के लिए कोई वैधानिक समय सीमा लागू नहीं होगी। यदि रिपोर्ट में देरी होती है तो किसान लोक सेवा गारंटी कानून के तहत जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ शिकायत या अपील भी नहीं कर पाएंगे। इससे समयबद्ध सेवा की कानूनी बाध्यता खत्म हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी परीक्षण खेती की उत्पादकता बढ़ाने और सही उर्वरक प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी प्रक्रिया है जबकि प्रमाणित बीज परीक्षण किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में इन सेवाओं के लिए समयबद्ध व्यवस्था समाप्त होने से किसानों को रिपोर्ट मिलने में देरी का सामना करना पड़ सकता है जिसका असर बुवाई और फसल प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।
सरकार की ओर से इस बदलाव के पीछे प्रशासनिक कारण बताए जा सकते हैं लेकिन किसानों के लिए यह फैसला कई सवाल भी खड़े करता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लोक सेवा गारंटी से बाहर होने के बावजूद कृषि विभाग इन सेवाओं को कितनी पारदर्शिता और समयबद्ध तरीके से उपलब्ध करा पाता है।
