मूंग खरीदी विवाद ने बढ़ाई सियासी हलचल किसानों ने पूछा मुख्यमंत्री रहते बढ़ा कोटा अब कृषि मंत्री बनकर क्यों नहीं मिली राहत
दरअसल मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्र से समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदी का कोटा 4.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का अनुरोध किया था। हालांकि केंद्र से अतिरिक्त कोटे की मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद प्रदेश सरकार ने अपने स्तर पर पात्र किसानों से 60 प्रतिशत तक मूंग खरीदी करने का निर्णय लिया और आंदोलन समाप्त कराने की कोशिश की।
किसान संगठनों का आरोप है कि पहले भी ऐसे हालात बनते रहे हैं लेकिन उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान केंद्र से बातचीत कर प्रदेश के लिए खरीदी का कोटा बढ़वाने में सफल रहते थे। इस बार ऐसा नहीं होने से किसानों में नाराजगी बढ़ी है। किसान स्वराज संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर मूंग उत्पादन होता है लेकिन खरीदी की सीमा तय होने के कारण किसानों को अपनी उपज का बड़ा हिस्सा खुले बाजार में कम कीमत पर बेचना पड़ता है जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने भी केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेदों का असर किसानों पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका कहना है कि यदि समय रहते समाधान निकाल लिया जाता तो किसानों को आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। किसान संगठनों ने यह भी कहा कि सरकारों को राजनीतिक विवादों से ऊपर उठकर किसानों के हित में निर्णय लेने चाहिए।
किसानों की नाराजगी के पीछे आर्थिक कारण भी हैं। इस वर्ष मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 8768 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है जबकि खुले बाजार में किसानों को लगभग 5500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। शुरुआत में प्रति एकड़ केवल 1.20 क्विंटल मूंग ही समर्थन मूल्य पर खरीदी जा रही थी जबकि शेष उपज बाजार में कम दाम पर बेचनी पड़ रही थी। इससे प्रति एकड़ किसानों की आय में हजारों रुपए का अंतर आ रहा था और बड़े किसानों को लाखों रुपए तक का नुकसान होने की आशंका थी।
इस पूरे विवाद के बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश सरकार को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री आशा योजना के नियमों के अनुसार केंद्र अधिकतम 25 प्रतिशत उत्पादन ही समर्थन मूल्य पर खरीद सकता है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश के लिए 4 लाख 54 हजार 580 मीट्रिक टन मूंग खरीदी की स्वीकृति दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि देशभर में स्वीकृत कुल खरीदी का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश को दिया गया है जो किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अधिक है।
हालांकि प्रदेश सरकार का तर्क है कि मध्य प्रदेश देश में सबसे अधिक मूंग उत्पादन और खरीदी करने वाला राज्य है इसलिए अन्य राज्यों में उपयोग नहीं हो रहे कोटे का हिस्सा मध्य प्रदेश को दिया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ मिल सके। फिलहाल सरकार द्वारा 60 प्रतिशत खरीदी की घोषणा के बाद आंदोलन थम गया है लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक पूरी उपज समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं जाएगी तब तक यह मुद्दा पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाएगा।
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MadhyaPradesh, MoongProcurement, FarmersProtest, ShivrajSinghChouhan, MSP मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों का आंदोलन भले ही फिलहाल समाप्त हो गया हो लेकिन इसके बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सवालों का सिलसिला तेज हो गया है। प्रदेश के किसान अब यह जानना चाहते हैं कि जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और केंद्रीय कृषि मंत्री भी मध्य प्रदेश से ही आते हैं तो फिर समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदी का कोटा बढ़ाने में देरी क्यों हुई। किसानों का कहना है कि इसी मुद्दे को लेकर उन्हें तीन दिन तक राजधानी भोपाल में आंदोलन करना पड़ा जबकि समय रहते फैसला लिया जाता तो इस स्थिति से बचा जा सकता था।
दरअसल मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्र से समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदी का कोटा 4.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का अनुरोध किया था। हालांकि केंद्र से अतिरिक्त कोटे की मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद प्रदेश सरकार ने अपने स्तर पर पात्र किसानों से 60 प्रतिशत तक मूंग खरीदी करने का निर्णय लिया और आंदोलन समाप्त कराने की कोशिश की।
किसान संगठनों का आरोप है कि पहले भी ऐसे हालात बनते रहे हैं लेकिन उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान केंद्र से बातचीत कर प्रदेश के लिए खरीदी का कोटा बढ़वाने में सफल रहते थे। इस बार ऐसा नहीं होने से किसानों में नाराजगी बढ़ी है। किसान स्वराज संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर मूंग उत्पादन होता है लेकिन खरीदी की सीमा तय होने के कारण किसानों को अपनी उपज का बड़ा हिस्सा खुले बाजार में कम कीमत पर बेचना पड़ता है जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने भी केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेदों का असर किसानों पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका कहना है कि यदि समय रहते समाधान निकाल लिया जाता तो किसानों को आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। किसान संगठनों ने यह भी कहा कि सरकारों को राजनीतिक विवादों से ऊपर उठकर किसानों के हित में निर्णय लेने चाहिए।
किसानों की नाराजगी के पीछे आर्थिक कारण भी हैं। इस वर्ष मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 8768 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है जबकि खुले बाजार में किसानों को लगभग 5500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। शुरुआत में प्रति एकड़ केवल 1.20 क्विंटल मूंग ही समर्थन मूल्य पर खरीदी जा रही थी जबकि शेष उपज बाजार में कम दाम पर बेचनी पड़ रही थी। इससे प्रति एकड़ किसानों की आय में हजारों रुपए का अंतर आ रहा था और बड़े किसानों को लाखों रुपए तक का नुकसान होने की आशंका थी।
इस पूरे विवाद के बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश सरकार को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री आशा योजना के नियमों के अनुसार केंद्र अधिकतम 25 प्रतिशत उत्पादन ही समर्थन मूल्य पर खरीद सकता है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश के लिए 4 लाख 54 हजार 580 मीट्रिक टन मूंग खरीदी की स्वीकृति दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि देशभर में स्वीकृत कुल खरीदी का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश को दिया गया है जो किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अधिक है।
हालांकि प्रदेश सरकार का तर्क है कि मध्य प्रदेश देश में सबसे अधिक मूंग उत्पादन और खरीदी करने वाला राज्य है इसलिए अन्य राज्यों में उपयोग नहीं हो रहे कोटे का हिस्सा मध्य प्रदेश को दिया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ मिल सके। फिलहाल सरकार द्वारा 60 प्रतिशत खरीदी की घोषणा के बाद आंदोलन थम गया है लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक पूरी उपज समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं जाएगी तब तक यह मुद्दा पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाएगा।
