हाईकोर्ट में 31 अस्पतालों की सुनवाई ने पकड़ा नया मोड़, गलत जांच रिपोर्ट और अवैध संचालन के आरोपों से बढ़ी मुश्किलें
रिजाइंडर में कहा गया है कि सीएमएचओ की ओर से कोर्ट में दी गई रिपोर्ट भ्रामक है और उसमें वास्तविक स्थिति को पूरी तरह सामने नहीं रखा गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि गलत तथ्यों के आधार पर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई ताकि बिना नियमों का पालन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई प्रभावित हो सके।
याचिकाकर्ता ने अपने प्रत्युत्तर के साथ कई ऐसे दस्तावेज भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जिनके बारे में दावा किया गया कि वे कूटरचित हैं। इसके अलावा कुछ अस्पतालों के ऐसे रिकॉर्ड भी पेश किए गए जिनके संबंध में कहा गया कि वे आवश्यक वैधानिक अनुमति और पंजीयन के बिना संचालित हो रहे हैं जबकि आधिकारिक दस्तावेजों में अलग स्थिति दिखाई गई है। याचिका में यह भी कहा गया कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
इससे पहले हुई सुनवाई में भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि जिन 31 अस्पतालों के संबंध में मामला लंबित है उनके स्थान पर 34 संस्थानों की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। साथ ही विनायक पैथोलॉजी लैब और लेडी हलीमा हॉस्पिटल को सील किए जाने से जुड़े कथित फर्जी आदेश भी रिकॉर्ड पर रखने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा कुछ अस्पतालों की ओर से नगर निगम के कथित फर्जी शपथ पत्रों के आधार पर भवन अनुमति से जुड़े दस्तावेज पेश किए जाने का दावा भी किया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि जनहित याचिका दायर करने के बाद उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और हमले की कोशिशें भी हुई हैं। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी है और उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
अब ताजा सुनवाई में पेश किए गए रिजाइंडर और उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। कोर्ट यह जांच करेगी कि प्रस्तुत रिपोर्ट और रिकॉर्ड में कितनी सच्चाई है तथा यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या गलत जानकारी दी गई है तो उसके लिए क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले का फैसला इंदौर के स्वास्थ्य तंत्र और निजी अस्पतालों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में अस्पतालों के संचालन और नियामकीय व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है।
