August 16, 2026

लाल किले से मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का नाम न लेने पर आरिफ मसूद ने जताई नाराजगी, PM मोदी से माफी की मांग

0
untitled-1786871219

भोपाल । स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी और देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने प्रधानमंत्री के भाषण पर ऐतराज जताते हुए मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का मुद्दा उठाया है। मसूद ने आरोप लगाया कि आजादी के संघर्ष की चर्चा के दौरान मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं किया गया। उन्होंने इसे दुखद बताते हुए प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा है। प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता सेनानियों को व्यापक रूप से श्रद्धांजलि दी गई थी और इसके साथ ही देश के विकास तथा राष्ट्र निर्माण के कई मुद्दों पर जोर दिया गया।

आरिफ मसूद का कहना है कि भारत की आजादी किसी एक समुदाय की लड़ाई नहीं थी बल्कि इसमें देश के अलग अलग वर्गों और समुदायों के लोगों ने योगदान दिया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासन से देश को मुक्त कराने के संघर्ष में अनेक लोगों ने अपना जीवन और सर्वस्व कुर्बान किया। ऐसे में स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते समय मुस्लिम सेनानियों के योगदान को भी सामने रखना जरूरी है। मसूद ने अपने ज्ञापन में कहा है कि इतिहास के अलग अलग दौर में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों और उलेमा ने भी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया था।

मसूद ने अपने तर्क के समर्थन में देश के कई ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री यदि नेशनल वॉर मेमोरियल और अंडमान निकोबार की सेलुलर जेल जैसे स्थानों पर दर्ज नामों को देखें तो वहां विभिन्न समुदायों के स्वतंत्रता सेनानियों की मौजूदगी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास व्यापक है और इसे किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

कांग्रेस विधायक ने अपने ज्ञापन में 18वीं और 19वीं सदी के कई आंदोलनों का उल्लेख भी किया है। उन्होंने बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ में वर्णित फकीर और संन्यासी विद्रोह का उदाहरण देते हुए मजनू शाह फकीर और उनके साथियों का नाम लिया। मसूद के मुताबिक मजनू शाह के बाद मूसा शाह चिराग अली और नूरुल मोहम्मद जैसे लोगों ने भी इस संघर्ष को आगे बढ़ाया। उन्होंने 1857 के विद्रोह में अहमदुल्ला शाह मदरासी की भूमिका का भी उल्लेख किया और दावा किया कि उन्होंने कई इलाकों में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया।

मसूद ने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि उस दौर में बड़ी संख्या में लोगों को कठोर दमन का सामना करना पड़ा और मुस्लिम उलेमा समेत कई लोगों ने भी बलिदान दिया। ज्ञापन में उन्होंने विभिन्न ऐतिहासिक पुस्तकों और लेखों का हवाला देते हुए अंग्रेजी शासन के दौरान हुई कार्रवाई का जिक्र किया है। हालांकि ज्ञापन में बताए गए कुछ आंकड़ों और ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से आवश्यक है।

भोपाल में विधायक ने स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों वाला पोस्टर भी लगाया। उनका कहना है कि आजादी के संघर्ष की पूरी तस्वीर देश के सामने रखी जानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां यह समझ सकें कि भारत की स्वतंत्रता अनेक लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी। मसूद ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को सभी समुदायों के योगदान के साथ देखा जाए।

मसूद ने अपने ज्ञापन के अंत में कहा कि देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री के भाषण में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं होने को लेकर आपत्ति दर्ज कराई और इस पर देश से माफी मांगने की मांग की। इस मुद्दे के सामने आने के बाद स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अलग अलग समुदायों की भूमिका और राजनीतिक दलों के बीच इतिहास की व्याख्या को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *