मानसून में बढ़ा जानलेवा खतरा मच्छर के काटने से हो सकती है दिमाग में सूजन जानिए जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और बचाव
जापानी इंसेफेलाइटिस जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस के कारण होता है। यह वायरस फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है जिसमें डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस भी शामिल हैं। संक्रमण मुख्य रूप से क्यूलेक्स प्रजाति के संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। ये मच्छर बारिश के मौसम में धान के खेतों तालाबों दलदली क्षेत्रों और लंबे समय तक जमा पानी वाली जगहों पर तेजी से पनपते हैं। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत क्यूलेक्स मच्छर शाम से लेकर सुबह तक सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिए रात के समय विशेष सावधानी जरूरी होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो वायरस सबसे पहले रक्त में प्रवेश करता है। इसके बाद यह ब्लड ब्रेन बैरियर को पार करके मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। दिमाग में संक्रमण फैलने के बाद सूजन की स्थिति बनती है जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है। यही कारण है कि यह बीमारी बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि इसका असर सीधे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 68000 लोग जापानी इंसेफेलाइटिस से संक्रमित होते हैं। दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र इसके सबसे बड़े प्रभावित इलाके हैं। भारत में भी हर वर्ष इसके मामले सामने आते हैं। बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है। विशेष रूप से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग धान के खेतों में काम करने वाले किसान और ऐसे यात्री जिन्होंने टीकाकरण नहीं कराया है उनके संक्रमित होने की संभावना अधिक रहती है।
इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल संक्रमण जैसी दिखाई देती है। शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार सिरदर्द उल्टी कमजोरी और अत्यधिक थकान शामिल हो सकते हैं। लेकिन यदि वायरस दिमाग तक पहुंच जाए तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है। मरीज में तेज बुखार के साथ भ्रम की स्थिति बेहोशी दौरे पड़ना गर्दन में अकड़न चलने में कठिनाई और चेतना खोने जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी होता है क्योंकि इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है।
डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से हर बार इस बीमारी की पुष्टि नहीं हो पाती। आवश्यकता पड़ने पर एमआरआई रक्त जांच और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए संक्रमण की पुष्टि की जाती है। फिलहाल इस बीमारी का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। उपचार के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखना संक्रमण से होने वाली जटिलताओं को नियंत्रित करना और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यप्रणाली बनाए रखना ही मुख्य उद्देश्य होता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बीमारी से बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है। मच्छरों से बचने के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनें रात में मच्छरदानी का उपयोग करें घर और आसपास पानी जमा न होने दें तथा जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। जिन क्षेत्रों में जापानी इंसेफेलाइटिस का खतरा अधिक है वहां स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले टीकाकरण का लाभ अवश्य लेना चाहिए। थोड़ी सी सावधानी इस गंभीर बीमारी से सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच बन सकती है।
