July 29, 2026

BreathEasy तकनीक से बदल सकती है कैंसर स्क्रीनिंग, कुत्ते सूंघकर करेंगे शुरुआती पहचान, जानिए कैसे करेगा काम

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नई दिल्ली । कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में समय पर पहचान सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। यदि शुरुआती चरण में बीमारी का पता चल जाए तो उपचार की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसी दिशा में भारत की एक डीप टेक स्टार्टअप डॉग्नोसिस ऐसी नई तकनीक विकसित कर रही है जो भविष्य में कैंसर की स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकती है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें ब्लड टेस्ट या स्कैन की जगह केवल व्यक्ति की सांस के नमूने का विश्लेषण किया जाएगा और इस प्रक्रिया में प्रशिक्षित कुत्तों की असाधारण सूंघने की क्षमता का उपयोग होगा।

कंपनी ने अपनी इस तकनीक का नाम ब्रीथईजी रखा है। इसका उद्देश्य कैंसर का अंतिम निदान करना नहीं बल्कि उन लोगों की पहचान करना है जिनमें कैंसर होने का जोखिम अधिक हो सकता है। ऐसे लोगों को बाद में बायोप्सी ब्लड टेस्ट या इमेजिंग जैसी पारंपरिक जांच कराने की सलाह दी जाएगी। यदि मौजूदा क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं तो कंपनी वर्ष 2027 की शुरुआत में इस तकनीक को भारत में व्यावसायिक रूप से लॉन्च करने की योजना बना रही है।

यह तकनीक एक वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है। जब शरीर में कैंसर कोशिकाएं विकसित होती हैं तो वे वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स नामक सूक्ष्म रासायनिक अणु छोड़ती हैं जो सांस के साथ बाहर निकलते हैं। इंसानों की तुलना में कुत्तों की सूंघने की क्षमता कई हजार गुना अधिक संवेदनशील होती है इसलिए वे इन सूक्ष्म रासायनिक संकेतों को पहचान सकते हैं। डॉग्नोसिस मुख्य रूप से बीगल नस्ल के प्रशिक्षित कुत्तों का उपयोग कर रही है हालांकि अन्य नस्लों को भी इस कार्य के लिए तैयार किया जा रहा है।

कंपनी की तकनीक केवल कुत्तों के व्यवहार पर निर्भर नहीं रहती। इसके साथ एक आधुनिक ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस भी विकसित किया गया है जो नमूने को सूंघते समय कुत्ते के मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड और विश्लेषित करता है। इससे परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। सांस का नमूना एक विशेष मास्क में लगभग दस मिनट तक सांस लेने के बाद लिया जाता है और फिर उसे स्वचालित प्रणाली में जांचा जाता है। कंपनी का दावा है कि यह प्लेटफॉर्म एक बार में 200 से अधिक नमूनों की जांच बिना मानवीय हस्तक्षेप के कर सकता है।

फिलहाल यह तकनीक बड़े स्तर के क्लिनिकल परीक्षणों से गुजर रही है। शुरुआती अध्ययनों में कुछ मामलों में गलत पॉजिटिव और गलत निगेटिव परिणाम भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक में संभावनाएं जरूर हैं लेकिन इसे नियमित स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाने से पहले बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रमाण और व्यापक परीक्षण आवश्यक होंगे।

विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह तकनीक कैंसर का अंतिम इलाज या अंतिम जांच नहीं है। इसका उद्देश्य केवल शुरुआती स्क्रीनिंग करना है ताकि जोखिम वाले लोगों की समय रहते पहचान हो सके और उन्हें आगे की आवश्यक चिकित्सीय जांच के लिए भेजा जा सके। यदि यह तकनीक सफल साबित होती है तो भविष्य में वार्षिक हेल्थ चेकअप का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जल्द पहचान में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

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