March 8, 2026

US: ट्रंप के करीबी ने पेश किया रूस से व्यापार करने वाले देशों पर सख्त प्रतिबंधों वाला नया बिल…

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वाशिंगटन। भारत (India) की रूस (Russia) के साथ आर्थिक और सामरिक साझेदारी (Economic and Strategic Partnership) एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है। अमेरिका (America) के प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम (Republican Senator Lindsey Graham) ने रूस से व्यापार करने वाले देशों के खिलाफ सख्त प्रतिबंधों वाला नया बिल पेश किया है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। इस विधेयक का उद्देश्य रूस पर यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए आर्थिक दबाव डालना है, लेकिन इसके दायरे में भारत जैसे देश भी आ रहे हैं, जो रूस से तेल और अन्य संसाधनों का आयात करते हैं। जानकारों का मानना है कि अमेरिकी सीनेट में प्रस्तावित ‘सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025’ भारत के लिए गंभीर आर्थिक और कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

अमेरिकी सांसद ग्राहम ने रविवार को एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा, “मेरे पास रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल के लिए 84 सीनेटरों का समर्थन है। यह बिल रूस, चीन और भारत के लिए एक आर्थिक बंकर बस्टर साबित होगा।” ‘सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025’ को इस साल अप्रैल में अमेरिकी सीनेट में पेश किया गया था। यह कानून उन देशों पर भारी अमेरिकी टैरिफ (कर) लगाने की सिफारिश करता है, जो रूसी मूल के तेल, गैस, यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करते हैं। साथ ही, यह रूस की कंपनियों, सरकारी संस्थाओं और प्रमुख नीति निर्धारकों पर व्यापक प्रतिबंध लगाने की भी मांग करता है।

क्या है सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025?
अप्रैल 2025 में अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए इस विधेयक में उन देशों पर 500% तक के भारी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है, जो रूस से तेल, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने इस विधेयक को “रूस, भारत और चीन के खिलाफ आर्थिक बंकर बस्टर” करार दिया है। बंकर बस्टर एक सैन्य शब्द है, जो उन हथियारों या रणनीतियों के लिए उपयोग होता है, जो गहरे और मजबूत ठिकानों, जैसे भूमिगत बंकरों या किलेबंदी, को नष्ट करने में सक्षम होते हैं। हाल ही में अमेरिका ने अपने सबसे घातक बंकर बस्टर का इस्तेमाल ईरान के परमाणु ठिकानों को खत्म करने के लिए किया है। अब अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ‘सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025’ को “आर्थिक बंकर बस्टर” कहकर इसका प्रतीकात्मक उपयोग किया, जिसका अर्थ है कि यह विधेयक रूस, भारत और चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर इतना गहरा और विनाशकारी प्रभाव डालेगा कि उनकी आर्थिक नींव कमजोर हो जाएगी, जैसे एक बंकर बस्टर बम किसी मजबूत सैन्य ठिकाने को ध्वस्त करता है।

भारत रूस से ऊर्जा आयात में दूसरा सबसे बड़ा देश
एनर्जी एंड क्लीन एयर रिसर्च सेंटर (CREA) के अनुसार, मई 2025 में भारत ने रूस से 4.2 बिलियन यूरो मूल्य के जीवाश्म ईंधन खरीदे, जिनमें से 72% केवल कच्चा तेल था। इस स्थिति में भारत इस कानून के सीधे प्रभाव में आ सकता है। हालांकि, बिल में यह प्रावधान भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए एक बार के लिए 180 दिनों की छूट दे सकते हैं। इसका उपयोग भारत जैसे रणनीतिक साझेदार देश को समय देने के लिए किया जा सकता है।

ग्राहम ने भारत और चीन को चेताया
सीनेटर ग्राहम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाते हैं। वे पहले भी भारत से रूस के साथ व्यापार कम करने की मांग कर चुके हैं। उन्होंने 13 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “चीन और भारत – अगर आप पुतिन की युद्ध मशीन को समर्थन देना जारी रखते हैं, तो इसके लिए आप खुद जिम्मेदार होंगे।” ‘सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025’ को अब तक दो बार सीनेट में पढ़ा जा चुका है और इसे बैंकिंग, आवास और शहरी मामलों संबंधी समिति को सौंपा गया है। इसे कानून बनने के लिए सीनेट, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और अंत में राष्ट्रपति ट्रंप की मंजूरी लेनी होगी।

भारत के लिए ऊर्जा संकट का खतरा?
ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ के अनुसार, यदि भारत को रूसी तेल से हाथ खींचने को मजबूर किया गया, तो इससे वैश्विक तेल कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है। उन्होंने कहा, “ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों पर पहले से ही प्रतिबंध लगे हैं। अगर भारत और अन्य देशों को रूसी तेल खरीदने से रोका गया, तो आपूर्ति घटेगी और कीमतें बढ़ेंगी।” वशिष्ठ ने यह भी कहा कि भारत पहले से ही पश्चिम एशिया में तनाव से जूझ रहा है। उन्होंने कहा, “ईरान जैसे देशों में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है। अगर इसके साथ रूसी तेल भी बाजार से हटा दिया गया, तो भारत के लिए यह एक जटिल और चुनौतीपूर्ण स्थिति बन जाएगी।”

अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाम भारत की रणनीति
भारत अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और रूस के साथ पारंपरिक संबंधों के बीच संतुलन साधना होगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका इस बिल को पारित करता है और भारत इस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।

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