अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव
अमेरिका ने इस नई व्यवस्था के तहत कुल 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इनमें भारत सहित कुछ देशों को 10 प्रतिशत वाले समूह में रखा गया है, जबकि अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लागू किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जिन देशों ने फोर्स्ड लेबर से जुड़े उत्पादों पर रोक लगाने या श्रम मानकों में सुधार के लिए कदम उठाए हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम टैरिफ श्रेणी में रखा गया है।
भारत के लिए राहत की बात यह रही कि प्रारंभिक प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की बात कही गई थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि भारत ने श्रम मानकों, सप्लाई चेन की निगरानी और विदेशी व्यापार नीति में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। इन कदमों के आधार पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क में 2.5 प्रतिशत की कमी की गई। हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका भविष्य में भी इन सुधारों की निगरानी जारी रखेगा।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार माना जाता है। ऐसे में नया टैरिफ उन उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है जिनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अधिक है। टेक्सटाइल और गारमेंट्स, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा उद्योग, कृषि एवं खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और विभिन्न विनिर्माण उत्पादों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अतिरिक्त शुल्क लागू होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने और निर्यातकों पर कीमत कम करने का दबाव बनने की संभावना है।
फोर्स्ड लेबर का अर्थ ऐसी मजदूरी से है जिसमें किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम कराया जाता है। इसमें धमकी देना, वेतन रोकना, कर्ज के बदले काम कराने की मजबूरी, पहचान संबंधी दस्तावेज जब्त करना या नौकरी छोड़ने की स्वतंत्रता न देना जैसी स्थितियां शामिल होती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है और कई देश इस प्रकार के उत्पादों के आयात पर कड़ी निगरानी रखते हैं।
अमेरिकी कानून के सेक्शन 301 के तहत सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि किसी देश की व्यापारिक नीतियां या उत्पादन प्रणाली अमेरिकी उद्योगों के लिए अनुचित या नुकसानदायक मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ, आयात प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक कदम उठाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में जांच के बाद संबंधित देश से बातचीत भी की जाती है और उसके बाद अंतिम निर्णय लागू होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। यदि भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों, पारदर्शी सप्लाई चेन और गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करते हैं, तो भविष्य में शुल्क संबंधी दबाव कम करने के साथ वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बेहतर बना सकते हैं।
