होर्मुज और लाल सागर में बढ़ते तनाव से भारतीय कारोबार पर खतरा, निर्यात-आयात कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका
रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कच्चे तेल के आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसके अलावा एलएनजी और एलपीजी जैसी ऊर्जा आपूर्ति भी काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर करती है। ऐसे में इस समुद्री रास्ते पर किसी भी तरह का व्यवधान देश की ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत दोनों को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषण में कहा गया है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों समुद्री मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं। इससे ईंधन महंगा होने के साथ-साथ परिवहन, विनिर्माण और ऊर्जा आधारित उद्योगों की लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा असर महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक समुद्री परिवहन पहले से ही दबाव में है। यदि जहाजों को वैकल्पिक मार्गों से होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ी, तो सामान की डिलीवरी में दो से तीन सप्ताह तक अतिरिक्त समय लग सकता है। इससे मालभाड़ा, समुद्री बीमा प्रीमियम और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी अन्य लागतों में भी बढ़ोतरी होने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र के अलावा ऑटोमोबाइल, रसायन, उर्वरक, धातु और विनिर्माण जैसे उद्योग भी इस स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं। कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत कंपनियों के परिचालन खर्च को बढ़ाएगी, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आएगा। साथ ही सप्लाई चेन में देरी होने से उत्पादन और वितरण की गति भी प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार बड़ी कंपनियां अपने विविध आपूर्ति स्रोतों, बेहतर वित्तीय क्षमता और मजबूत वैश्विक नेटवर्क के कारण ऐसे झटकों का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकती हैं। वहीं छोटे और मझोले उद्यमों के सामने कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ने, नकदी प्रवाह पर दबाव और लाभप्रदता में कमी जैसी चुनौतियां अधिक गंभीर रूप से सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि समुद्री मार्गों में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर भी दिखाई देगा। ऐसे हालात में कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत, बेहतर जोखिम प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स रणनीति अपनाने की आवश्यकता होगी, ताकि संभावित आर्थिक झटकों के प्रभाव को कम किया जा सके।
