चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह
इन बंदरों का इस्तेमाल नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च में किया जाता है। हालांकि, कीमतों में अचानक आए इस उछाल के कारण कुछ शोधकर्ताओं को अपनी स्टडी तक रोकनी पड़ रही है।
क्यों बढ़ी मकॉक बंदरों की कीमत?
रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगझोउ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के लिए नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए उनकी लैब में मकॉक बंदरों की जरूरत होती है, लेकिन अब इनकी बढ़ती कीमत और कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है।
चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमत लगातार बढ़ी है। वर्तमान में सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन, यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।
गुओ शियांगयू के मुताबिक, समस्या सिर्फ कीमत की नहीं है। कई बार इतनी अधिक रकम देने के बावजूद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई सीमित है। गुओ ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।
रिसर्च के लिए मकॉक बंदर ही क्यों जरूरी?
वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। इनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। इसी वजह से नई दवाओं और उपचारों की जांच के लिए इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।
गुओ ने बताया कि उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की जरूरत होती है। इनमें पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध शामिल हैं।
चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों की दवा क्षेत्र में पकड़ को चुनौती देकर चीन को दुनिया का प्रमुख मेडिसिन हब बनाना है।
दवा बनाने की प्रक्रिया में बंदरों की भूमिका
किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है और इसके बाद जानवरों पर परीक्षण किए जाते हैं, ताकि दवा के प्रभाव और सुरक्षा का आकलन किया जा सके। इन चरणों में सफल होने के बाद ही संबंधित अधिकारियों की अनुमति और सर्टिफिकेशन के बाद दवा बाजार में लाई जाती है।
घटती संख्या बनी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है। देश में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं पर तेजी से काम हो रहा है।
लेकिन मकॉक बंदरों की कमी अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। बढ़ती मांग के कारण जंगलों में इनकी संख्या पर भी असर पड़ रहा है। अनुमान है कि चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल लैब रिसर्च के लिए करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही उपलब्ध हो पाएंगे।
