हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित हुई मोरारी बापू की ऐतिहासिक रामकथा, भारत से पहुंचे प्रमुख साधु-संतों ने भी लिया भाग
नौ दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत 15 अगस्त को हुई, जिसका समापन 23 अगस्त को होगा। इस आयोजन के दौरान शिक्षाविदों और आचार्यों के बीच तीन दिवसीय विशेष विद्वत चर्चा का भी आयोजन किया गया। मोरारी बापू ने कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सावन के पवित्र महीने में तुलसी जयंती के अवसर पर यह आयोजन ज्ञान, सत्य, प्रेम और करुणा के मूलभूत सिद्धांतों को उजागर करने के उद्देश्य से किया गया है।
विश्वविद्यालय के लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टीट्यूट की फैकल्टी डायरेक्टर प्रोफेसर डायना ने इस अवसर पर कहा कि भगवान राम की अयोध्या से शुरू होकर रामेश्वरम तक की 14 वर्षों की यात्रा ने भारतीय उपमहाद्वीप में पवित्र सांस्कृतिक स्थलों का निर्माण किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि रामलीला और रामचरितमानस की परंपरा भारत की सीमाओं से निकलकर थाईलैंड, इंडोनेशिया और कंबोडिया जैसे देशों तक विस्तृत हुई है।
समारोह में पहुंचे अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय के आदर्श वाक्य ‘वेरिटास’ यानी सत्य की तुलना भारतीय दर्शन के सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों से की। वक्ताओं ने कहा कि यह आयोजन दुनिया की सबसे प्राचीन पाठ और वाचन परंपराओं को दुनिया के शीर्ष शिक्षण संस्थानों के साथ जोड़ने का एक अनूठा प्रयास है।
मोरारी बापू द्वारा वर्ष 2010 में तुलसी जयंती के अवसर पर शुरू की गई इस विशेष पहल का मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति, ज्ञान परंपरा और रामचरितमानस के संदेशों को वैश्विक पटल पर संरक्षित और प्रसारित करना है। इससे पूर्व भी वे कैलाश मानसरोवर, वेटिकन सिटी, संयुक्त राष्ट्र संघ और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जैसे ऐतिहासिक स्थानों पर रामकथा का आयोजन कर चुके हैं।
हार्वर्ड में आयोजित इस कार्यक्रम में अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट जैसे आध्यात्मिक केंद्रों से पहुंचे साधु- संन्यासियों की उपस्थिति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। मध्य प्रदेश सहित भारत के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने भी इस वैश्विक आयोजन में अपनी सहभागिता दर्ज कराई। इस आयोजन को वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति और दर्शन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
