पीओके में जेएएसी का लॉन्ग मार्च शुरू, अधिकारियों से वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव
जेएएसी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह अपनी मांगों को लेकर चरणबद्ध तरीके से लॉन्ग मार्च आयोजित करेगा। योजना के अनुसार विभिन्न स्थानों से प्रदर्शनकारी एकत्र होकर रावलकोट पहुंचे और वहां से मुजफ्फराबाद की ओर कूच किया। आंदोलन के आयोजकों का कहना है कि उनकी मांगों को लेकर हुई वार्ता का कोई स्वीकार्य समाधान नहीं निकल सका, जिसके कारण आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
इस बीच यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी (यूकेपीएनपी) ने पाकिस्तानी प्रशासन से संयम बरतने की अपील की है। संगठन ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों के खिलाफ किसी भी प्रकार के बल प्रयोग से बचा जाना चाहिए। उसके अनुसार शांतिपूर्ण विरोध, संगठन बनाने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों के तहत महत्वपूर्ण अधिकार हैं, जिनका हर परिस्थिति में सम्मान किया जाना चाहिए।
यूकेपीएनपी ने यह भी दावा किया कि क्षेत्र में पिछले कुछ समय से जारी अशांति के दौरान कई लोगों की जान जा चुकी है। संगठन ने ऐसी सभी घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक मौत या घायल होने की घटना की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच होनी चाहिए, ताकि यदि कहीं कोई जिम्मेदारी बनती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
मार्च की घोषणा के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। विभिन्न सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की खबरों के बीच प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है। बढ़ी हुई सुरक्षा व्यवस्था के कारण इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है, हालांकि प्रदर्शनकारी अपने कार्यक्रम को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने की बात कह रहे हैं। प्रशासन की ओर से भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
यूकेपीएनपी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि वैश्विक संस्थाओं और प्रमुख देशों को क्षेत्र की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए तथा संवाद और शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके साथ ही स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया से भी घटनाक्रम की निष्पक्ष निगरानी और रिपोर्टिंग की अपील की गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि पीओके में मौजूदा घटनाक्रम आने वाले दिनों में क्षेत्रीय स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यदि वार्ता की प्रक्रिया दोबारा शुरू होती है और सभी पक्ष बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशते हैं तो तनाव कम होने की संभावना बन सकती है। वहीं यदि गतिरोध बना रहता है तो क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां और विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रह सकते हैं। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन और आंदोलनकारी आगे की स्थिति को किस प्रकार संभालते हैं और क्या दोनों पक्ष किसी नए संवाद के रास्ते पर सहमत हो पाते हैं।
