March 8, 2026

भारत कृषि उत्पादों पर नहीं देगा रियायत! US के साथ व्यापार-समझौते पर बातचीत गतिरोध

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वाशिंगटन। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच व्यापार समझौते (Trade agreement ) को लेकर बातचीत फिलहाल गतिरोध की स्थिति में पहुंच गई है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) द्वारा निर्धारित 8 जुलाई की समयसीमा भी तेजी से नजदीक आ रही है। यदि दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो पाता है तो इस तारीख के बाद अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात (Indian exports) पर 26% जवाबी टैरिफ लागू करने की संभावना है। भारत के मुख्य वार्ताकार राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में भारतीय दल वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों के साथ चर्चा के लिए रुका हुआ है, लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। हालांकि, ट्रंप यह स्पष्ट कर चुके हैं कि टैरिफ सस्पेंशन को और आगे बढ़ाने की संभावना बेहद कम है।

अमेरिका की मांगें और भारत की सख्ती
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका चाहता है कि भारत मक्का, सोयाबीन, डेयरी उत्पाद, सेब, और अन्य फलों एवं मेवों पर आयात शुल्क कम करे। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार इस मांग को मानने में हिचक रही है, क्योंकि इन उत्पादों से देश के लाखों छोटे किसान जुड़े हुए हैं। राजनीतिक रूप से भी कृषि क्षेत्र में रियायत देना सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता है। मोदी सरकार का कहना है कि इन उत्पादों पर निर्भर छोटे किसानों के हितों की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता है।

इसके अलावा, डेयरी और आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों पर भारत का रुख सख्त है, क्योंकि यह किसानों की आजीविका और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि भारत ने इससे पहले ऑस्ट्रेलिया और यूके के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में भी कृषि और डेयरी सेक्टर को बाहर रखा था। यूरोपीय यूनियन को भी भारत ने इसी तरह की झिझक दिखाई है।

अमेरिका की चेतावनी: कृषि उत्पादों के बिना डील नहीं
अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि अगर भारत कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम नहीं करता, भले ही यह सीमित मात्रा (कोटा) में ही क्यों न हो, तो कोई भी व्यापार समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। भारत की चिंताओं के बीच, अमेरिका की यह सख्ती बातचीत को और पेचीदा बना रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि 8 जुलाई की समयसीमा को बढ़ाने की संभावना कम है, हालांकि उन्होंने जून में कहा था कि वह समयसीमा बढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसे “आवश्यकता” नहीं मानते। यदि कोई समझौता नहीं होता, तो ऑटो पार्ट्स, लोहा और एल्यूमीनियम जैसे कुछ क्षेत्रों पर 25% या 50% के अतिरिक्त क्षेत्रीय टैरिफ लागू हो सकते हैं। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो सकता है, क्योंकि अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है।

भारतीय उद्योगों की चिंता: “वन-साइडेड डील” नहीं चाहिए
भारतीय वार्ताकारों की चिंता यह भी है कि अमेरिका ऑटोमोबाइल और व्हिस्की जैसे क्षेत्रों में जो रियायतें देने को तैयार है, उसके बदले भारत को परिधान, होम टेक्सटाइल, चमड़ा, जूते, इंजीनियरिंग सामान और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे उत्पादों में पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा है। कुछ उत्पादों जैसे ऑटो पार्ट्स, लोहा और एल्यूमिनियम पर पहले से ही 25% या 50% का अतिरिक्त सेक्टोरल टैरिफ लागू है, जो आगे भी जारी रह सकता है।

“मिनी डील” की कोशिशें जारी
हालांकि बातचीत टकराव की स्थिति में है, दोनों देश एक “मिनी डील” की तैयारी में लगे हैं, जो सितंबर-अक्टूबर में प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण से पहले लागू हो सकती है। यह डेडलाइन प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई पिछली मुलाकात में तय की गई थी। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को निर्यातकों के साथ बैठक में संकेत दिया कि आने वाले कुछ दिनों में डील की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि यदि कुछ सेक्टर पहले चरण में छूट जाते हैं, तो उन्हें बाद में जोड़ा जा सकता है।

उद्योग जगत की राय: “समझौता कर लिया जाए”
बंद दरवाजों के पीछे कई उद्योग प्रतिनिधियों ने वाणिज्य मंत्रालय से आग्रह किया है कि अमेरिका की कुछ मांगें मान ली जाएं ताकि भारतीय निर्यातक अनावश्यक टैरिफ से बच सकें। अमेरिकी अधिकारियों ने भी संकेत दिया है कि यदि टैरिफ पूरी तरह खत्म नहीं भी किए गए, तो 10% बेस टैरिफ पर डील हो सकती है- जो कि बाकी प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत के लिए फायदेमंद रहेगा।

ट्रंप को भी चाहिए “डील की जीत”
राष्ट्रपति ट्रंप के लिए भी यह डील अहम है। उन्होंने हाल ही में चीन के साथ एक समझौता कर “सफलता” का दावा किया था और कहा था कि भारत के साथ भी “एक बहुत बड़ी डील” जल्द होगी। अमेरिका के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वह ब्रिटेन, चीन और भारत जैसे देशों के साथ सफल समझौते कर रहा है- ताकि अन्य देशों पर भी दबाव बनाया जा सके। अब सबकी नजरें 8 जुलाई पर टिकी हैं- जब या तो एक डील होगी, या फिर भारत के लिए अमेरिकी बाजार महंगा हो जाएगा।

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