July 4, 2026

सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान के आरोपों की पड़ताल, जल संकट की जड़ में भारत नहीं बल्कि दशकों की नीतिगत लापरवाही?

0
37-1783168679
नई दिल्ली । पाकिस्तान में गहराते जल संकट को लेकर एक बार फिर भारत और सिंधु जल संधि चर्चा के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की ओर से भारत पर पानी रोकने और जल संकट पैदा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि मौजूदा स्थिति के पीछे सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की अपनी जल प्रबंधन प्रणाली, अधूरी परियोजनाएं और दशकों से चली आ रही नीतिगत कमियां हैं। इसी कारण यह बहस तेज हो गई है कि संकट का वास्तविक कारण सीमा पार की गतिविधियां हैं या घरेलू स्तर पर जल संसाधनों का कमजोर प्रबंधन।

सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के जल बंटवारे की व्यवस्था पहले से निर्धारित है। भारत को आवंटित पूर्वी नदियों के जल का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त है। हाल के वर्षों में भारत ने अपने हिस्से के पानी के बेहतर उपयोग के लिए कई सिंचाई और जल भंडारण परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत को आवंटित जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है, न कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकना।

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से पर्याप्त जलाशयों और आधुनिक जल संरक्षण ढांचे के निर्माण में अपेक्षित निवेश नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में पानी बिना उपयोग के समुद्र में बह जाता है। इसके अलावा कई बड़े बांधों में वर्षों से गाद जमा होने के कारण उनकी जल भंडारण क्षमता भी लगातार कम होती गई है, जिससे सूखे और जल संकट की स्थिति और गंभीर होती है।

जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े जानकारों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में पुरानी सिंचाई प्रणाली, रिसाव, अवैध जल दोहन और वितरण व्यवस्था की कमजोर निगरानी के कारण बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। कृषि क्षेत्र में भी पानी के उपयोग की दक्षता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जिससे उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कई शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन नेटवर्क की खराब स्थिति और अवैध जल आपूर्ति भी संकट को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

हाल के वर्षों में भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से कई परियोजनाओं को गति दी है। इनका उद्देश्य अपने हिस्से के जल का उपयोग बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना और जल संरक्षण को मजबूत बनाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन परियोजनाओं को सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप तैयार किया गया है और इनका उद्देश्य जल प्रवाह को राजनीतिक हथियार बनाना नहीं बल्कि उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करना है।

दूसरी ओर पाकिस्तान में जल अवसंरचना से जुड़े निवेश में कमी, नए बांधों के निर्माण में देरी और जल संरक्षण योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न विश्लेषणों में यह बात सामने आई है कि यदि समय रहते जलाशयों का विस्तार, वितरण व्यवस्था का आधुनिकीकरण और जल संरक्षण पर प्रभावी निवेश किया जाता, तो वर्तमान संकट की गंभीरता काफी हद तक कम हो सकती थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट जैसे जटिल मुद्दे का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से संभव नहीं है। दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रभावी जल प्रबंधन, आधुनिक अवसंरचना, जल संरक्षण तकनीकों का व्यापक उपयोग और संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता होगी। ऐसे कदम ही भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय स्तर पर स्थायी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *