अमेरिकी चुनावों पर विदेशी दखल का दावा तेज, व्हाइट हाउस ने चीन पर वोटर डेटा चोरी का लगाया गंभीर आरोप
व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक दस्तावेज में दावा किया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में ऐसे संकेत मिले हैं कि चीन से जुड़े साइबर समूहों ने वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़ी ऐसी जानकारियां हासिल कीं, जो पूरी तरह सार्वजनिक नहीं थीं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि विदेशी ताकतें चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर सकती हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, विदेशी हस्तक्षेप केवल चुनाव के दिन मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, मतदाताओं और चुनावी ढांचे से जुड़ी सूचनाओं को निशाना बनाना भी शामिल हो सकता है। प्रशासन ने कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन सिस्टम और उससे जुड़े डेटा पर हमला चुनावी प्रक्रिया में बाधा पैदा करने का एक तरीका हो सकता है।
व्हाइट हाउस के दस्तावेज में बताया गया कि वर्ष 2022 की खुफिया रिपोर्ट में एक चीनी साइबर नेटवर्क से जुड़े समूह की पहचान की गई थी, जिसने व्यावसायिक वेबसाइटों पर मौजूद मतदाता पंजीकरण डेटा तक पहुंच बनाई थी। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ऐसे साइबर समूह अक्सर ऐसी सूचनाएं जुटाने की कोशिश करते हैं, जो सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं होती हैं।
अमेरिकी सरकार ने साइबर हमलों से जुड़े संभावित खतरों का भी उल्लेख किया है। प्रशासन के अनुसार, यदि किसी विदेशी ताकत को मतदाता डेटा तक पहुंच मिल जाती है, तो वह उसमें बदलाव करने, मतदाताओं को मतदान में परेशानी पहुंचाने या चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने जैसी गतिविधियों की कोशिश कर सकती है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित डेटा हासिल करने की घटना से किसी चुनाव परिणाम पर कोई सीधा प्रभाव पड़ा है।
यह मामला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विदेशी चुनावी गतिविधियों से जुड़े कुछ खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के फैसले के बाद सामने आया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का उद्देश्य चुनावी सुरक्षा से जुड़े आकलनों में पारदर्शिता बढ़ाना और विदेशी साइबर गतिविधियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है।
व्हाइट हाउस ने बताया कि कई प्रमुख अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति के बयान और इससे जुड़े दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में सहयोग किया। प्रशासन के अनुसार, इन एजेंसियों ने उपलब्ध खुफिया जानकारी के आधार पर तथ्यों की समीक्षा की।
चीन की ओर से इस आरोप पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, अमेरिका और चीन के बीच पहले भी साइबर सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और डेटा सुरक्षा को लेकर तनाव रहा है। दोनों देशों के बीच डिजिटल क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।
अमेरिका में चुनावी सुरक्षा को लेकर यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब दुनिया भर में साइबर हमलों और डिजिटल हस्तक्षेप के खतरे बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनाव प्रणालियों की सुरक्षा के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे और लगातार निगरानी की आवश्यकता है।
