October 21, 2026

भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल

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नई दिल्ली। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की रणनीति को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन का रुख चर्चा में है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश रूसी तेल खरीदने के लिए भारत और चीन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाएं, लेकिन उसके सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट ने इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अकेले प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए।

अमेरिकी टीवी चैनल NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश एक ओर रूस के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर रूसी ऊर्जा का आयात भी जारी रखते हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के आयात से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

‘अकेला अमेरिका ही प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए?’

बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश खुद रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं, तो अमेरिका ही इस दिशा में अकेले कदम क्यों उठाए।

अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोप के ऊर्जा आयात को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की तुलना में रूस और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसा दिया है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिका करीब 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें लगभग 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों का रूसी उत्पादों का आयात अमेरिका के मुकाबले करीब दस गुना है।

प्रतिबंधों और टैरिफ पर 60 दिनों की अस्थायी छूट

अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से जुड़ी छूट को 60 दिनों के लिए अस्थायी रूप से दिया गया है। इसका उद्देश्य इन उपायों के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना है।

वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ‘लिंडसे ओ’ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को परिस्थितियों का आकलन करने की छूट है। बेसेंट के मुताबिक, शुक्रवार को राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के जरिए 60 दिनों की छूट दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे स्थायी रूप से प्रतिबंध हटाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति इन 60 दिनों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।

रुबियो ने इस दौरान ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव, सऊदी अरब में हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध का भी उल्लेख किया।

ट्रंप ने फैसले को बताया था अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा

शुक्रवार को मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव किया था। उन्होंने इसे अमेरिका और दुनिया, दोनों के लिए अच्छा निर्णय बताया। हालांकि, इस कदम को लेकर अमेरिकी राजनीति में विरोध भी सामने आया है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों ने फैसले पर सवाल उठाए हैं।

भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर कहा कि ट्रंप का कदम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है। वहीं, सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप प्रशासन के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अमेरिका और उसके साझेदारों को चुकानी पड़ रही है।

रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद ऐसे समय सामने आए हैं, जब यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। फिलहाल 60 दिनों की अस्थायी छूट के बाद अमेरिकी प्रशासन की अगली रणनीति पर नजर रहेगी।

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