July 3, 2026

'मुन्ना भाई एमबीबीएस' के सेट से अचानक क्यों गायब हो जाते थे संजय दत्त? सह-कलाकार यतिन कार्येकर ने सालों बाद बयां किया शूटिंग का अनसुना दर्द

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नई दिल्ली । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता संजय दत्त के जीवन में एक दौर ऐसा भी था, जब वे अपनी पेशेवर प्रतिबद्धताओं और गंभीर कानूनी लड़ाइयों के बीच बुरी तरह फंसे हुए थे। साल 2003 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की शूटिंग के दौरान सेट पर बने रहने के लिए उन्हें जिस मानसिक और शारीरिक संघर्ष से गुजरना पड़ा, उसका एक बेहद भावुक और अनसुना पहलू अब सामने आया है। फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सह-कलाकार और अनुभवी अभिनेता यतिन कार्येकर ने हाल ही में उस दौर की परिस्थितियों को याद करते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

यतिन कार्येकर ने बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान संजय दत्त आर्म्स एक्ट मामले और टाडा अदालत की सख्त कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रहे थे। स्थिति इतनी अनिश्चित थी कि सेट पर काम करते समय भी अभिनेता का पूरा ध्यान अपनी अदालती तारीखों और कानूनी मामलों पर लगा रहता था। सेट पर मौजूद हर व्यक्ति इस बात से वाकिफ था कि संजय दत्त किस भारी मानसिक दबाव और तनाव के साए में कैमरे के सामने अभिनय कर रहे थे।

शूटिंग के दिनों के माहौल को साझा करते हुए कार्येकर ने बताया कि अक्सर सेट पर अचानक एक फोन कॉल आता था और उसे सुनते ही संजय दत्त बिना किसी से कुछ कहे या बिना कोई औपचारिकता निभाए चुपचाप सेट छोड़कर चले जाते थे। उन्हें अचानक अदालत की कार्यवाही में शामिल होने के लिए तुरंत रवाना होना पड़ता था। ऐसे अनपेक्षित घटनाक्रमों के कारण फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी को कई बार भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।

संजय दत्त के अचानक चले जाने के बाद निर्देशक को पूरी स्थिति को संभालने के लिए तुरंत अपने पूर्व-निर्धारित शूटिंग शेड्यूल में बदलाव करने पड़ते थे। निर्देशक हिरानी को अक्सर उन दृश्यों या शॉट्स को पूरी तरह बदलना पड़ता था, जिनमें संजय दत्त की मौजूदगी अनिवार्य थी। अभिनेता की अनुपस्थिति के कारण सेट पर मौजूद अन्य कलाकारों के साथ अलग दृश्यों की योजना बनाई जाती थी ताकि शूटिंग का कीमती समय बर्बाद न हो और काम सुचारू रूप से चलता रहे।

इस भारी व्यक्तिगत संकट और कानूनी दबाव के बावजूद संजय दत्त ने कभी भी अपने काम की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। जब भी वे अदालत की कार्यवाही से लौटकर वापस सेट पर आते थे, तो वे पूरी तरह से अपने किरदार ‘मुन्ना भाई’ में ढल जाते थे। कार्येकर के अनुसार, संजय दत्त की यह क्षमता अद्भुत थी कि वे इतनी बड़ी मानसिक उथल-पुथल के बीच भी कैमरे के सामने आते ही अपने सारे गम और तनाव भूलकर एक जीवंत प्रदर्शन देने में सफल रहते थे।

फिल्म के क्रू और साथी कलाकारों ने भी उस कठिन समय में संजय दत्त का भरपूर सहयोग किया। सेट पर मौजूद सभी लोग अभिनेता की बेबसी और उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को गहराई से समझते थे। उनके पिता सुनील दत्त भी उस समय बेटे को इस संकट से निकालने के लिए हर संभव कानूनी और नैतिक प्रयास कर रहे थे। यही कारण था कि पूरी टीम ने बिना किसी शिकायत के हर विपरीत परिस्थिति में निर्देशक और अभिनेता के साथ तालमेल बिठाया।

‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ न केवल संजय दत्त के करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक साबित हुई, बल्कि इसने उनके गिरते हुए करियर को एक नई संजीवनी भी प्रदान की थी। आज सालों बाद जब सेट के ये वाकये सामने आ रहे हैं, तो यह साफ होता है कि पर्दे पर दर्शकों को हंसाने और गुदगुदाने वाले ‘मुन्ना भाई’ के पीछे एक अभिनेता का कितना बड़ा व्यक्तिगत दर्द और अदालती संघर्ष छिपा हुआ था, जिसने भारतीय सिनेमा इतिहास की एक कालजयी फिल्म को आकार दिया।

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