March 8, 2026

किरदार को सच्चा दिखाने के लिए शबाना आज़मी ने अपनाया अनोखा तरीका, जुगल हंसराज ने किया खुलासा

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नई दिल्ली:बॉलीवुड में कई ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने अपने किरदार को पर्दे पर जीवंत दिखाने के लिए खुद को पूरी तरह उसमें ढाल लिया। कई बार तो अभिनेता अपने निजी व्यवहार रिश्तों और भावनाओं तक को नियंत्रित कर लेते हैं ताकि फिल्म में दिखाई जाने वाली सच्चाई जरा भी कमजोर न पड़े। ऐसी ही मिसाल 42 साल पहले दिग्गज अभिनेत्री शबाना आज़मी ने फिल्ममासूम के दौरान पेश की थी जिसका खुलासा अब फिल्म के चाइल्ड आर्टिस्ट रहे जुगल हंसराज ने किया है।

साल 1983 में रिलीज हुईमासूम आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे संवेदनशील और भावनात्मक फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह ने पति-पत्नी की भूमिका निभाई थी जबकि जुगल हंसराज ने उनके पति के नाजायज़ बेटे का किरदार निभाया था। यही रिश्ता कहानी की भावनात्मक धुरी भी था।हाल ही में जुगल हंसराज ने एक इंटरव्यू में बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान शबाना आज़मी उनसे जानबूझकर दूरी बनाकर रखती थीं। उस वक्त जुगल महज 9 साल के थे और उन्हें यह बात समझ में नहीं आती थी कि शबाना जी उनसे बात क्यों नहीं करतीं जबकि सेट पर मौजूद अन्य बच्चों से वह बेहद प्यार और अपनापन दिखाती थीं।

जुगल ने बताया कि फिल्म में उर्मिला मातोंडकर और आराधना शबाना आज़मी की बेटियों के रोल में थीं। शबाना उनके साथ सेट पर खूब बातें करती थीं हंसती-मुस्कुराती थीं और मां जैसा स्नेह भी देती थीं। लेकिन जुगल के मामले में उनका व्यवहार बिल्कुल अलग था। वह उनसे औपचारिक दूरी बनाए रखती थीं और ज्यादा बातचीत से बचती थीं।जुगल के मुताबिक उस उम्र में उन्हें यह अजीब लगता था लेकिन समय के साथ उन्हें समझ आया कि यह सब शबाना आज़मी के अभिनय के प्रोसेस का हिस्सा था। दरअसल फिल्म में शबाना का किरदार जुगल के किरदार को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता। दोनों के बीच एक अनकहा तनाव अजनबीपन और असहजता होती है जिसे पर्दे पर दिखाना बेहद जरूरी था।

शबाना आज़मी नहीं चाहती थीं कि असल जिंदगी में जुगल के साथ अपनापन बढ़े क्योंकि ऐसा होने से कैमरे के सामने वह भावनात्मक दूरी और असहजता स्वाभाविक रूप से नहीं आ पाती। यही वजह थी कि उन्होंने जानबूझकर एक बच्चे से भी भावनात्मक फासला बनाए रखा ताकि दर्शकों को कहानी असली लगे।जुगल हंसराज ने यह भी कहा कि आज पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें एहसास होता है कि शबाना आज़मी ने कितनी खूबसूरती और ईमानदारी से अपने किरदार के साथ न्याय किया। उस दौर में इस तरह की तैयारी और किरदार में डूब जाना बहुत कम देखने को मिलता था।गौरतलब है किमासूम का निर्देशन शेखर कपूर ने किया था और फिल्म में सईद जाफरी तनुजा और सुप्रिया पाठक जैसे दमदार कलाकार भी नजर आए थे। फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से जबरदस्त सराहना मिली थी और बाद में इसे तेलुगु और तुर्की भाषाओं में भी रीमेक किया गया।आज भीमासूम को भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है और शबाना आज़मी का यह समर्पण नए कलाकारों के लिए एक मिसाल माना जाता है।

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